नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का शोर जैसे-जैसे परवान चढ़ रहा है, लोकतंत्र के इस उत्सव का रंग पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। इस बार के चुनाव में राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों से ‘विकास’ के पन्ने गायब हैं और उनकी जगह ‘स्थानीय अस्मिता’ और ‘सांस्कृतिक पहचान’ ने ले ली है।
असम की गलियों से लेकर तमिलनाडु के तटों तक, हर पार्टी जनता के विकास की जरूरतों के बजाय उनके भावनात्मक मुद्दों को कुरेदकर वोट साधने की जुगत में है। अब मुकाबला इस बात पर नहीं है कि किसने कितनी सड़कें बनाईं, बल्कि इस पर है कि कौन अपनी संस्कृति का सबसे बड़ा रक्षक है।
पश्चिम बंगाल: ‘सोनार बांग्ला’ बनाम ‘बाहरी’ की जंग
बंगाल के रणक्षेत्र में 15 सालों के कामकाज का हिसाब बैकस्टेज चला गया है। यहाँ फ्रंट सीट पर ‘राष्ट्रवाद और धर्म’ के सुपरहिट डायलॉग्स का कब्जा है। बीजेपी जहाँ जनसांख्यिकीय बदलाव और घुसपैठ को बंगाल की अस्मिता के लिए खतरा बता रही है, वहीं ममता बनर्जी ने इसे बंगाल की संस्कृति पर हमला करार दिया है।
ममता का ‘मछली और अंडा’ खाने की आजादी का मुद्दा हो या बीजेपी का ‘धार्मिक संतुलन’ का नैरेटिव, बंगाल में चुनाव अब पूरी तरह खान-पान, भाषा और रीजनल प्राइड के इर्द-गिर्द सिमट गया है।
असम: ‘मियां’ और ‘यूसीसी’ के बीच फंसी सियासत
पूर्वोत्तर के द्वार असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ‘असमिया अस्मिता’ का कार्ड पूरी ताकत से खेला है। यूसीसी (UCC) और ‘मियां’ (घुसपैठियों) को बाहर निकालने का मुद्दा उठाकर उन्होंने चुनाव को डेमोग्राफिक सुरक्षा की लड़ाई बना दिया है। दूसरी ओर, कांग्रेस इसे असम की साझा संस्कृति पर प्रहार बताकर पलटवार कर रही है।
दक्षिण का संग्राम: हिंदुत्व बनाम द्रविड़ पहचान
दक्षिण भारत के राज्यों में भी कहानी कुछ अलग नहीं है। तमिलनाडु में मुकाबला ‘हिंदुत्व’ बनाम ‘द्रविड़ अस्मिता’ के बीच है। डीएमके जहाँ भाषा और तमिल संस्कृति को ढाल बनाकर मैदान में है, वहीं बीजेपी हिंदुत्व के नैरेटिव के साथ अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही है।
केरल में भी विकास की जगह ‘सबरीमाला मंदिर’ और धार्मिक संवेदनाओं की सॉफ्ट पॉलिटिक्स हावी है। सोना चोरी का मुद्दा हो या मंदिर की परंपरा, हर दल खुद को केरल की संस्कृति का सच्चा पहरेदार साबित करने में जुटा है।
4 मई को होगा पहचान की राजनीति का फैसला
कुल मिलाकर, राज्य और किरदार जरूर बदले हैं, लेकिन सभी दलों की स्क्रिप्ट एक ही है “पहचान की राजनीति”। जनता अब ‘काम’ पर मुहर लगाती है या ‘इमोशन’ पर, इसका फैसला 4 मई को आने वाले नतीजे करेंगे। फिलहाल, इन भावनात्मक मुद्दों ने 2026 के इस चुनावी मुकाबले को बेहद दिलचस्प और पेचीदा बना दिया है।

