विरासत पर लापरवाही का साया: आगरा के 265 स्मारकों पर मंडराया संकट, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

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आगरा (बृज खंडेलवाल): दुनिया भले ही ताजमहल की धवल चमक पर फिदा हो, लेकिन इसी शहर की गलियों में इतिहास सिसक रहा है। आगरा की असली पहचान उसके गुमनाम मकबरे, टूटते दरवाजे और झाड़ियों में तब्दील होते मुगलकालीन बाग आज व्यवस्था की अनदेखी के कारण दम तोड़ रहे हैं। इस प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ एडवोकेट आकाश वशिष्ठ की जनहित याचिका (PIL) ने अब कानूनी जंग छेड़ दी है, जिससे पुरातत्व विभाग और सरकार के गलियारों में हड़कंप मच गया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख: 8 हफ्ते में मांगा जवाब

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आगरा, झांसी, वृंदावन और लखनऊ जैसे ऐतिहासिक शहरों में बिखरती धरोहरों पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब तलब किया है। याचिका में खुलासा हुआ है कि उत्तर प्रदेश में 5400 से अधिक ऐतिहासिक स्थल दर्ज हैं, लेकिन संरक्षण का कवच केवल 421 को ही प्राप्त है।

एएसआई के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर

आगरा सर्किल के अंतर्गत 265 संरक्षित स्मारक आते हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले 15 वर्षों से ‘हेरिटेज बायलॉज’ की फाइलें सिर्फ दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। कागजों पर सितंबर 2023 से अप्रैल 2025 के बीच एक भी नया अतिक्रमण दर्ज नहीं किया गया, जबकि हकीकत में अवैध निर्माणों ने स्मारकों का दम घोंट दिया है। यमुना का बढ़ता प्रदूषण और गिरता भूजल स्तर इन प्राचीन इमारतों की नींव को खोखला कर रहा है।

​उपेक्षा की भेंट चढ़ती ‘गुमनाम’ विरासत

विरासत संरक्षक डॉ. मुकुल पांड्या के अनुसार, दारा शिकोह की लाइब्रेरी, सुल्तान परवेज का मकबरा, चीनी का रौजा, हम्माम अलीवर्दी खान और जसवंत सिंह की छतरी जैसे अनमोल स्मारक आज खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। वहीं, वृंदावन में 48 से अधिक प्राचीन घाट और कुंड संरक्षण की बाट जोह रहे हैं। आगरा आने वाले सालाना 80 लाख पर्यटक अक्सर ताजमहल तक ही सीमित रह जाते हैं, जबकि शहर की असली ‘आत्मा’ कही जाने वाली ये धरोहरें इतिहास के अंधेरे में खोती जा रही हैं।

​अदालत के कड़े निर्देश: अब जवाबदेही तय होगी

माननीय न्यायालय ने संस्कृति मंत्रालय और राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि:

​प्रदेश की सभी धरोहरों की एक विस्तृत सूची तैयार की जाए।

​हर स्मारक के लिए विशिष्ट ‘बायलॉज’ बनाकर उनका सख्ती से पालन हो।

स्मारकों की सुरक्षा के लिए अलग स्टाफ और एक प्रभावी ‘हेरिटेज बोर्ड’ का गठन किया जाए।

​यह केवल पत्थरों का संकट नहीं, बल्कि हमारी पहचान और गौरवशाली अतीत का सवाल है। क्या अदालत की इस दस्तक के बाद जिम्मेदार जागेंगे, या आगरा का गौरव यूँ ही खामोशी से मलबे में दफन हो जाएगा?