जौहर की स्मृति और शब्दों की मर्यादा: इतिहास, नारी-अस्मिता और सार्वजनिक विमर्श में संवेदना की जरूरत

इतिहास केवल बीती हुई घटनाओं का संग्रह नहीं है। वह समाज की सामूहिक स्मृति, पीड़ा, संघर्ष, त्याग और अस्मिता का दस्तावेज भी है। इसलिए इतिहास के किसी संवेदनशील प्रसंग पर चर्चा करते समय केवल वर्तमान दृष्टि को आधार बनाना पर्याप्त नहीं होता। उसके पीछे छिपे सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संदर्भों को समझना भी उतना ही […]

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क्या Phone आपको आपसे बेहतर जानता है? गुरुमां योगिता खत्री ने बताई Digital Habits की सच्चाई

एक शाम एक युवा लड़की मेरे सामने बैठी थी। बातचीत के बीच अचानक उसका phone vibrate हुआ। उसने बात रोक दी, screen देखी, message का जवाब दिया और फिर phone table पर रख दिया। कुछ ही मिनट बाद फिर वही हुआ। मैंने उससे पूछा, “क्या कोई बहुत जरूरी message था?” उसने मुस्कुराकर कहा, “नहीं… बस […]

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गुमनाम हो रहे स्वतंत्रता संग्राम के वीर: आगरा के पहले शहीद परशुराम और अन्य सेनानियों के त्याग की अनकही दास्तान

झंडा ऊचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा… इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए, 9 अगस्त 1942 को पूरे देश में अनगिनत कंठों से यह राष्ट्रभक्ति गीत गूंज उठा था। हाथों में तिरंगा झंडा लेकर देशभक्त शहर ही नहीं, गांवों की सड़कों पर उमड़ पड़े थे। भारतमाता के जयघोष से पूरा […]

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सांस्कृतिक परंपराओं को निभाते हुए उज्ज्वल भविष्य की तलाश करता भारत का युवा

हर साल श्रावण के पवित्र महीने में, उत्तर भारत की सड़कें केसर से भर जाती हैं, क्योंकि लाखों कांवड़िया कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं। वे हरिद्वार और गंगोत्री जैसे तीर्थ स्थलों से पवित्र गंगाजल लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर भगवान शिव को अर्पित करते हैं। यह भक्ति, अनुशासन, सहनशीलता और सामूहिक आस्था का एक […]

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शिक्षा, समानता और राष्ट्र निर्माण का आधार हैं सरकारी विद्यालय: आधुनिक दौर में इनकी प्रासंगिकता पर विशेष चिंतन की जरूरत

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसके विशाल भवनों, चौड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों या आर्थिक विकास दर से नहीं मापी जाती। किसी देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। शिक्षा ही वह आधार है जिस पर सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और आर्थिक प्रगति का पूरा ढाँचा खड़ा होता है। यदि शिक्षा […]

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सच्ची आध्यात्मिकता बनाम ढोंग: क्या स्व-घोषित बाबाओं पर कानूनी शिकंजा धार्मिक आस्था में हस्तक्षेप है?

भारत को हमेशा से संतों, ऋषियों और आध्यात्मिक ज्ञान की भूमि के रूप में जाना जाता रहा है। सदियों से पवित्र पुरुष और महिलाएं दूसरों को करुणा, सत्य, आत्म-अनुशासन और सेवा के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। विभिन्न सुधारकों और संतों के सिद्धांतों ने भारतीय समाज को व्यापक रूप से प्रभावित […]

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आस्था की चौखट पर असुरक्षा: सामाजिक विश्वास और सांस्कृतिक चेतना पर सीधा आघात

भारत की सांस्कृतिक पहचान केवल उसके इतिहास, भाषाओं और परंपराओं से नहीं बनती, बल्कि उन आस्था-स्थलों से भी निर्मित होती है जिन्होंने सदियों से समाज को नैतिकता, सहअस्तित्व और सामुदायिक एकता का संदेश दिया है। मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं हैं; वे विश्वास, संस्कृति, लोकजीवन और सामाजिक सहभागिता के जीवंत केंद्र हैं। यहां लोग […]

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पानी की लड़ाई में क्यों घुला जातिवाद? आंदोलन की मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों पर डॉ. प्रियंका सौरभ का विशेष विश्लेषण

हरियाणा के हांसी क्षेत्र के चैनत गाँव में पानी की समस्या को लेकर चल रहा आंदोलन एक महत्वपूर्ण सामाजिक और प्रशासनिक प्रश्न को सामने लाता है। किसी भी नागरिक समाज में पीने के पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए लोगों को सड़क पर उतरना पड़े, यह अपने आप में शासन व्यवस्था के लिए चिंता का […]

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कोचिंग संस्कृति के चौराहे पर शिक्षा: क्या ज्ञान से ज्यादा बिक रहा है ब्रांड?

भारत में शिक्षा को सदियों से ज्ञान, संस्कार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना गया है। शिक्षक को समाज में विशेष सम्मान प्राप्त रहा है क्योंकि वह केवल विषय ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण भी करता है। किंतु पिछले कुछ दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन […]

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सफाई कर्मचारी: आधुनिक शहर की व्यवस्था के असली शिल्पकार

किसी भी शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या चमकती रोशनियों से नहीं, बल्कि उसकी स्वच्छता और व्यवस्था से होती है। जब कोई व्यक्ति किसी शहर में प्रवेश करता है, तो सबसे पहले उसकी नज़र वहाँ की साफ़-सफाई, वातावरण और नागरिक अनुशासन पर जाती है। स्वच्छ शहर केवल सुंदर नहीं दिखते, बल्कि वे […]

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