आगरा। ताजनगरी के अकोला क्षेत्र में स्मार्ट मीटरों के खिलाफ हुए उग्र प्रदर्शन के बाद अब बिजली विभाग और प्रशासन ‘एक्शन मोड’ में आ गया है। विभाग ने विरोध की आवाज उठाने वाले ग्रामीणों के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसते हुए सामूहिक एफआईआर दर्ज कराई है। इस कार्रवाई में 16 लोगों को नामजद किया गया है, जबकि 500 से 600 अज्ञात महिलाओं और पुरुषों को भी मुकदमे के दायरे में लाया गया है। प्रशासन के इस कड़े रुख के बाद क्षेत्र में आक्रोश की लहर और तेज हो गई है।
एसडीओ ने दर्ज कराया मामला
अकोला सब स्टेशन के एसडीओ हिमांशु गुप्ता की तहरीर पर यह मुकदमा दर्ज किया गया है। विभाग का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने न केवल सरकारी काम में बाधा डाली, बल्कि बिजलीघर में घुसकर तोड़फोड़ भी की। एफआईआर में तर्क दिया गया है कि ग्रामीणों ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया, राजस्व की हानि की और जानबूझकर बिजली आपूर्ति में व्यवधान पैदा किया।
क्या है एफआईआर की पूरी कहानी?
शिकायत के अनुसार, 01 मई की सुबह करीब 7:30 बजे अकोला और आसपास के गांवों के ग्रामीण सब स्टेशन पहुँचे और तैनात एसएसओ प्रेमशंकर पर बिजली काटने का दबाव बनाया। देखते ही देखते नगला जयराम और नगला परमाल जैसे इलाकों से 500-600 लोगों का हुजूम जमा हो गया। आरोप है कि भीड़ ने न केवल नारेबाजी की, बल्कि अपने साथ उखाड़ कर लाए गए स्मार्ट मीटरों को बिजलीघर परिसर में फेंक कर माहौल को हिंसक बना दिया।
नामजद आरोपी और किसान नेताओं का अल्टीमेटम
पुलिस ने टिंकू उर्फ मोरध्वज, रविंद्र, पंकज, सचिन, रवि और कुलदीप समेत 16 ग्रामीणों को नामजद किया है। इस कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए किसान नेता श्याम सिंह चाहर ने प्रशासन को खुली चुनौती दी है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि ये मुकदमे तुरंत वापस नहीं लिए गए, तो बिजली कार्यालय का घेराव किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी विभाग के अधिकारियों की होगी।
सियासी गलियारों में सुलगते सवाल
इस प्रशासनिक कार्रवाई ने एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या तेज दौड़ते मीटरों और फर्जी बिलिंग से परेशान जनता के खिलाफ एफआईआर करना न्यायसंगत है? क्या विभाग अपनी कमियों को सुधारने के बजाय पीड़ितों की आवाज को मुकदमों के जरिए दबाना चाहता है?
2027 के चुनाव पर ‘स्मार्ट’ संकट
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि स्मार्ट मीटरों को लेकर पनपा यह असंतोष भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। एक तरफ विपक्ष इस मुद्दे को भुनाने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीणों पर मुकदमों की बौछार बीजेपी के ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे को चोट पहुँचा सकती है। अगर अधिकारियों की मनमानी और बिजली कंपनियों की लूट पर लगाम नहीं लगी, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी दल को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

