आगरा: डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में मंगलवार को एक बड़ा हादसा होते-होते बचा, लेकिन इस घटना ने विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निर्माण और मरम्मत के नाम पर किए जा रहे ‘करोड़ों के खेल’ की पोल खोलकर रख दी है। विश्वविद्यालय के विधि संकाय (Law Faculty) में दो कमरों की फॉल सीलिंग और छत का हिस्सा अचानक भरभराकर गिर गया। इस मलबे की चपेट में आने से कर्मचारी बलवीर सिंह घायल हो गए, जिन्हें आनन-फानन में अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
हादसे ने खोल दी भ्रष्टाचार की परतें
विश्वविद्यालय परिसर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मरम्मत और सुंदरीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए हैं। लेकिन कल हुए हादसे के बाद स्थिति साफ है कि यह पैसा दीवारों की मजबूती पर नहीं, बल्कि फाइलों को चमकाने में खर्च हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, छत गिरने के बाद वहां केवल पुरानी ईंटें और जर्जर ढांचा दिखाई दे रहा है, जो घटिया निर्माण सामग्री की गवाही दे रहा है।
कर्मचारी की जान जोखिम में, छात्रों में दहशत
हादसे के वक्त कर्मचारी बलवीर सिंह कमरे में मौजूद थे। मलबा गिरते ही वहां चीख-पुकार मच गई। अन्य कर्मचारियों ने उन्हें बाहर निकाला, वरना परिणाम और भी घातक हो सकते थे। इससे पहले भी डिग्री विभाग के पास एक कर्मचारी पर प्लास्टर गिर चुका है। बार-बार हो रही इन घटनाओं से अब छात्रों और कर्मचारियों में डर का माहौल है। छात्रों का कहना है कि अगर यह हादसा क्लास के दौरान होता, तो कई मासूमों की जान जा सकती थी।
NSUI ने साधा निशाना: “करोड़ों का घोटाला हुआ है”
हादसे की सूचना मिलते ही एनएसयूआई (NSUI) के नेता सतीश सिकरवार मौके पर पहुंचे। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा, “नेक (NAAC) ग्रेडिंग और मरम्मत के नाम पर विवि में करोड़ों का घोटाला हुआ है। अधिकारियों ने कार्य की गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं की? इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर तुरंत मुकदमा दर्ज होना चाहिए।”
जिम्मेदारों की चुप्पी
इतने बड़े हादसे के बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया उदासीन बना हुआ है। इस संबंध में जब कुलसचिव अजय मिश्रा से जानकारी लेने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। विश्वविद्यालय की जर्जर होती इमारतें और गिरती छतें अब सीधे तौर पर प्रशासन की जवाबदेही पर सवालिया निशान लगा रही हैं।
एक सवाल आपके लिए: क्या आपको लगता है कि इस तरह के हादसों के लिए केवल ठेकेदारों पर कार्रवाई काफी है, या उन अधिकारियों पर भी शिकंजा कसना चाहिए जिन्होंने घटिया काम को ‘पास’ किया?


