गुमनाम हो रहे स्वतंत्रता संग्राम के वीर: आगरा के पहले शहीद परशुराम और अन्य सेनानियों के त्याग की अनकही दास्तान

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झंडा ऊचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा…

इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए,

9 अगस्त 1942 को पूरे देश में अनगिनत कंठों से यह राष्ट्रभक्ति गीत गूंज उठा था। हाथों में तिरंगा झंडा लेकर देशभक्त शहर ही नहीं, गांवों की सड़कों पर उमड़ पड़े थे। भारतमाता के जयघोष से पूरा माहौल गूंज उठा था। सभी में देश पर सर्वस्व समर्पण करने की भावना हलोरें ले रहीं थी।

यही माहौल 10 अगस्त 1942 को आगरा में भी था। मुंबई में आठ अगस्त 1942 को कांग्रेस महासमिति की बैठक में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा करते हुए करो या मरो का आह्वान किया था। पूरे देश में नौ अगस्त को स्वाधीनता आंदोलन की अंतिम क्रांति की चिंगारी भड़क गई थी।

आगरा में देरी से सूचना आने पर 10 अगस्त 1942 को आंदोलन शुरू हुए थे। क्रांति भड़क गई थी। ऐसा कोई मुहल्ला नहीं था, जहां से जुलूस नहीं निकाले जा रहे थे। विभिन्न स्थानों से निकाले गए जुलूस दरेसी पर पुरानी चुंगी के मैदान के पास पहुंच गए। यहां एक विशाल सभा का आयोजन किया गया था। अचानक इतनी भीड़ देखकर अंग्रेजी प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। पुलिस ने सभा स्थल को चारों ओर से घेर लिया। सभा भंग करने की अपील बार-बार पुलिस अधिकारियों ने की, लेकिन देशभक्त मानने वाले नहीं थे। जोश बढ़ता ही जा रहा था।

सभा की अध्यक्षता विख्यात स्वाधीनता सेनानी बाबूलाल मीतल कर रहे थे। पुलिस ने वहां गोली चला दी। एक गोली छीपीटोला निवासी परशुराम के लगी और वह वहीं शहीद हो गए। इसके बाद भगदड़ मच गई। सैंकड़ों लोगों की गिरफ्तारियां हुईं। जेल भर दी गईं। कम उम्र के लोगों को पुलिस ने गाडिय़ों में भर कर जंगल में छोड़ दिया। पूरे जिले में पुलिस ने जबर्दस्त अत्याचार किए थे। परशुराम, अगस्त क्रांति के प्रदेश में प्रथम शहीद थे।

इस शहादत के बाद तो पूरे जनपद में आंदोलन शुरू हो गए थे। सरकारी कार्यालय फूंक दिए गए। रेलवे लाइन उखाड़ दीं गई थीं।

आजादी के बाद शहीद परशुराम का नाम अब आगरा में ही कोई नहीं जानता। उनके नाम का शिलापट बिजलीघर चौराहा और छीपीटोला चौराहा पर लगाए गए थे, वे भी कई दशकों से गायब हैं।

जनपद में इन्होंने दी थी शहादत

जनपद में विभिन्न स्थानों पर आंदोलन हुए, उनमें सुल्तानपुर की जेल में इंद्रचंद्र पैंगोरिया शहीद हो गए थे. दरेसी पर परशुराम, बरहन में केवल सिंह, चमरौला में साहब सिंह, खजान सिंह, सोरन सिंह व उल्फत सिंह शहीद हुए थे। इन शहीदों के नाम से आज तक कहीं भी स्मारक नहीं हैं। चमरौला में स्मारक बनाया गया था, लेकिन वह भी अब जर्जर हो चुका है।

आंदोलन में इनकी भी रही थी प्रमुख भूमिका

पं. श्रीकृष्णदत्त पालीवाल, सेठ अचल सिंह, ठाकुर उल्फत सिंह चौहान, पं. श्रीराम शर्मा, जगन प्रसाद रावत, प्रकाशनारायण शिरोमणि, गोपाल नारायण शिरोमणि, शंभूनाथ चतुर्वेदी, पं.भोगीलाल मिश्रा, श्रीमती प्रेमवती मिश्रा, रानी सरोज गौरिहार, पं. कालीचरन तिवारी, बाल मुकुंद बल्लाजी, देवकीनंदन विभव, वासुदेव गुप्ता, रोशनलाल गुप्त करुणेश आदि अनेक स्वाधीनता सेनानियों ने इस आंदोलन को गति प्रदान की थी।

-आदर्श नंदन गुप्ता-

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यसेवी हैं।)