आगरा, 19 मई। ताजनगरी के जयपुर हाउस, प्रताप नगर स्थित प्रसिद्ध श्री बुर्जीवाला मंदिर में इन दिनों अध्यात्म और भक्ति की अविरल धारा बह रही है। श्री बुर्जीवाला मंदिर संचालन समिति के तत्वावधान में आयोजित की जा रही सात दिवसीय भव्य श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन मंगलवार को पावन परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
कथा सत्र की शुरुआत “गोविंद बोलो हरि गोपाल बोलो, राधा रमण हरि गोविंद बोलो…” के मधुर और भक्तिपूर्ण संकीर्तन के साथ हुई, जिसकी दिव्य धुनों पर पंडाल में मौजूद भक्तजन भावविभोर होकर झूम उठे।
दूसरे दिन की मुख्य कथा का गरिमापूर्ण शुभारंभ भारत सरकार के केंद्रीय राज्यमंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके पश्चात मुख्य व्यास पीठ से मंगलाचरण, कुन्ती स्तुति एवं भीष्म स्तुति के अत्यंत मार्मिक प्रसंगों का श्रवण कराया गया।
परहित में किया गया कर्म ही वास्तविक पूजा है: आचार्य राजेश शास्त्री
व्यास पीठ पर विराजमान प्रख्यात कथाव्यास आचार्य राजेश शास्त्री महाराज ने ज्ञानोपदेश देते हुए कहा कि किसी भी मनुष्य के प्रति वास्तविक सम्मान शब्दों में नहीं, बल्कि हमारी आंखों और आचरण में होना चाहिए। उन्होंने पुरुषार्थ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि केवल बौद्धिक चातुर्य नहीं, बल्कि निष्काम कर्म और अनवरत पुरुषार्थ ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाता है।
उन्होंने आगे कहा कि जीवन में हमेशा सत्कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि कर्म के मार्ग पर चलकर ही भगवत प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जब हमारा कोई कर्म किसी दूसरे दुखी व्यक्ति को सुख और संबल पहुंचाने के लिए किया जाता है, तो वह कर्म स्वयं एक पवित्र पूजा का रूप ले लेता है।
कथा में जीवंत हुआ राजा परीक्षित के श्राप का प्रसंग
कथाक्रम को आगे बढ़ाते हुए आचार्य जी ने महाभारत कालीन प्रसंग सुनाते हुए कहा कि चक्रवर्ती राजा परीक्षित एक बार वन में शिकार के दौरान तीव्र प्यास से व्याकुल होकर महर्षि शमीक के आश्रम पहुंचे थे। वहां गहन तपस्या में लीन ऋषि से जब उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला, तो राजा ने क्षणिक आवेश में आकर एक मृत सर्प को ऋषि के गले में डाल दिया। इस दृश्य को देखकर ऋषि पुत्र श्रृंगी क्रोधित हो उठे और उन्होंने राजा परीक्षित को सात दिनों के भीतर तक्षक नाग के डसने से मृत्यु का घोर श्राप दे दिया।
राजा परीक्षित ने इस विपदा को भी ईश्वर की परम इच्छा मानकर सहज स्वीकार किया और तत्काल अपना संपूर्ण राजपाट त्याग कर आत्मचिंतन व भगवद् स्मरण के लिए गंगा तट की ओर प्रस्थान कर गए।
वैराग्य और भक्ति का महत्व, महिलाओं की रही भारी उपस्थिति
कथा के मुख्य यजमान गौरव बंसल और निधि बंसल ने बताया कि द्वितीय दिवस की कथा में व्यासजी ने मानव जीवन की क्षणभंगुरता, वैराग्य की आवश्यकता और अटूट भगवत् भक्ति के गूढ़ महत्व को विस्तार से समझाया। अध्यात्म के इस समागम में पुरुषों की तुलना में महिला श्रद्धालुओं की उपस्थिति अत्यधिक रही।
उन्होंने बताया कि बुधवार को कथा के तीसरे दिन सती चरित्र, ध्रुव चरित्र तथा भक्त प्रह्लाद चरित्र के दिव्य प्रसंग सुनाए जाएंगे। यह भागवत कथा आगामी 24 मई तक प्रतिदिन दोपहर 4:00 बजे से सायं 7:00 बजे तक अनवरत रूप से आयोजित की जाएगी।
इस आध्यात्मिक अनुष्ठान को सफल बनाने में कथा संयोजक शकुन बंसल, श्याम भदौरिया, जितेन्द्र भोजवानी, रामशंकर अग्रवाल, केशव अग्रवाल, राजकुमार अग्रवाल, अनूप अग्रवाल, सुनील मित्तल, दिनेश अग्रवाल, विजय बंसल, ज्योतिमोहन जिंदल, आलोक जैन और पीयूष सिंघल सहित समस्त संचालन समिति के पदाधिकारी और सेवादार मुख्य रूप से जुटे हुए हैं।


