आगरा में देश भर के न्यूरो एक्सपर्ट्स का महामंथन: ‘मिड टर्म सीएमई-2026’ में साझा हुईं ब्रेन-स्पाइन इलाज की आधुनिक तकनीकें

Health

आगरा। बदलती आधुनिक जीवनशैली, अत्यधिक मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप (BP), मधुमेह (डायबिटीज) और अनियमित दिनचर्या के कारण आज देश में ब्रेन स्ट्रोक, स्पाइन रोग और गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियां महामारी की तरह पैर पसार रही हैं। इन घातक बीमारियों के सबसे आधुनिक, सटीक और प्रभावी इलाज को लेकर रविवार को आगरा के प्रतिष्ठित होटल जेपी पैलेस में चिकित्सा जगत का एक अभूतपूर्व महामंथन देखने को मिला। यहाँ यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी एवं न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी, आगरा द्वारा ‘भविष्य की ओर अग्रसर’ थीम पर ‘मिड टर्म सीएमई-2026’ का भव्य आयोजन किया गया।

देश भर से आए 130 से अधिक न्यूरोसर्जन, न्यूरोलॉजिस्ट और स्पाइन विशेषज्ञों ने नवीनतम तकनीकों, शोध और जटिल ऑपरेशन पद्धतियों पर गहन चर्चा करते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि समय पर इलाज, आधुनिक तकनीक और सही जीवनशैली ही लकवा, ब्रेन हेमरेज और रीढ़ संबंधी गंभीर बीमारियों से बचाव का सबसे बड़ा हथियार हैं।

आधुनिक तकनीक से सुरक्षित इलाज हमारा लक्ष्य: डॉ. अरविंद अग्रवाल

आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल ने देशभर से आए विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए कहा कि न्यूरोसर्जरी अत्यंत सूक्ष्म, धैर्यपूर्ण और सटीक चिकित्सा पद्धति है। आधुनिक तकनीकों और नवीन अनुसंधानों के माध्यम से मरीजों को सुरक्षित और बेहतर उपचार उपलब्ध कराना ही आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है।

उन्होंने कहा कि अब सर्वाइकल स्पाइन और स्लिप डिस्क जैसी गंभीर समस्याओं की सर्जरी भी अत्याधुनिक तकनीकों से कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी हो चुकी है। नई विधियों से हाथ-पैर खराब होने का खतरा कम हुआ है और मरीज को जल्दी खड़ा और बैठाया जा सकता है।

सुबह से शाम तक चला वैज्ञानिक मंथन

सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक चले वैज्ञानिक सत्रों में ब्रेन स्ट्रोक, ब्रेन हेमरेज, स्पाइन टीबी, सर्वाइकल डिस्क, ट्यूमर और बच्चों की रीढ़ संबंधी जटिल बीमारियों पर विशेषज्ञ व्याख्यान, शोध पत्र और पैनल चर्चा हुई।

मुख्य अतिथि प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉ. आरसी मिश्रा, यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल, सचिव डॉ. अरविंद कनकने, आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल, सचिव डॉ. विनय अग्रवाल, डॉ. आलोक अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता और डॉ. मयंक अग्रवाल ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

देर रात जागना बना स्ट्रोक का बड़ा कारण

एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. पीके माहेश्वरी ने बायोलॉजिकल क्लॉक और ब्रेन अटैक विषय पर बेहद महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए कहा कि देर रात तक जागना, देर से भोजन करना, पैदल न चलना और शारीरिक श्रम से दूरी लोगों को स्ट्रोक, अवसाद और उच्च रक्तचाप की ओर धकेल रही है।

उन्होंने बताया कि देर रात जागने वालों में मेलाटोनिन हार्मोन कम हो जाता है, जिससे लकवे के बाद रिकवरी भी धीमी हो जाती है और मृत्यु दर बढ़ जाती है। उन्होंने लोगों से जीवनशैली और खानपान बदलने की अपील की।

लकवे के मरीज के लिए शुरुआती तीन घंटे सबसे अहम

महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज झांसी के प्रोफेसर एवं यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी के सचिव डॉ. अरविंद कनकने ने स्ट्रोक में थ्रंबोलाइसिस विषय पर बताया कि लकवे के मरीज में शुरुआती साढ़े चार घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

उन्होंने कहा कि नसों में इंजेक्शन द्वारा थक्का घोलकर मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बहाल किया जाता है। यदि मरीज को आदर्श रूप से तीन घंटे के भीतर उपचार मिल जाए तो स्थायी विकलांगता और गंभीर नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

कैंसर नहीं, फिर भी कैंसर जैसा व्यवहार करता है यह ट्यूमर

प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डॉ. आरसी मिश्रा ने सीएनएस हिमेंजिओब्लास्टोमाज पर व्याख्यान देते हुए कहा कि यह ऐसा खतरनाक ट्यूमर है जो कैंसर न होते हुए भी कैंसर जैसा व्यवहार करता है।

उन्होंने बताया कि यह ट्यूमर मस्तिष्क के अत्यंत संवेदनशील हिस्सों में विकसित होता है जहाँ से सांस नियंत्रित होती है। इसकी सर्जरी अत्यंत चुनौतीपूर्ण होती है और कई बार अनुभवी सर्जनों के लिए भी कठिन स्थिति पैदा कर देती है।

अब मुंह नहीं, नाक के रास्ते हो रही जटिल सर्जरी

संजय गांधी पीजीआई लखनऊ के विभागाध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल ने आधुनिक एंडोस्कोपिक तकनीकों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पहले गर्दन और खोपड़ी के जंक्शन की सर्जरी के लिए मुँह में बड़ा चीरा लगाना पड़ता था।

अब एंडोनेजल एंडोस्कोपिक तकनीक से नाक के रास्ते छोटी सर्जरी कर मरीज का उपचार संभव हो गया है। इससे दर्द, संक्रमण और खतरा काफी कम हो गया है।

रीढ़ की टीबी युवाओं में तेजी से बढ़ रही

रीढ़ की हड्डी में टीबी को लेकर आयोजित पैनल चर्चा में डॉ. अरविंद अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता, डॉ. सुयश सिंह, मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. यशपाल बुंदेला और डॉ. संतोष कुमार ने चेतावनी दी कि युवाओं में स्पाइनल टीबी तेजी से बढ़ रही है।

विशेषज्ञों ने कहा कि लगातार बुखार, कमर दर्द, पैरों में झनझनाहट, कमजोरी और चलने में परेशानी को नजरअंदाज न करें। समय रहते जांच और इलाज बेहद जरूरी है।

ब्लड प्रेशर बना ब्रेन हेमरेज का सबसे बड़ा कारण

ब्रेन स्ट्रोक पर आयोजित पैनल चर्चा में डॉ. विनय अग्रवाल, डॉ. मयंक अग्रवाल, केजीएमयू लखनऊ के डॉ. बीके ओझा, डॉ. विकास बंसल, मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली के डॉ. विवेक कुमार और डॉ. अंकुर अग्रवाल ने कहा कि उच्च रक्तचाप ब्रेन हेमरेज का सबसे बड़ा कारण बन चुका है।

डॉ. विनय अग्रवाल ने कहा कि हृदय रोगियों में लकवे का खतरा अधिक रहता है और ब्लड प्रेशर नियंत्रण में रखकर इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

झाड़-फूंक और देसी इलाज से बढ़ रहा खतरा

न्यूरोसर्जन डॉ. मयंक अग्रवाल ने कहा कि आज भी अनेक मरीज विज्ञापनों और झूठे दावों के बहकावे में आकर मालिश, नस सुतवाने, झाड़-फूंक और देसी इलाज का सहारा लेते हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि स्पाइन और नसों की बीमारी में ऐसे उपचार मरीज को स्थायी नुकसान पहुँचा सकते हैं।

हर ब्रेन हेमरेज मरीज का ऑपरेशन जरूरी नहीं

अपोलो हॉस्पिटल लखनऊ के विभागाध्यक्ष डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने “गेंगलीओकैप्सूलर हेमरेज” विषय पर कहा कि ब्रेन हेमरेज के हर मरीज का ऑपरेशन करना उचित नहीं होता।

उन्होंने बताया कि विश्वस्तरीय शोध से सिद्ध हो चुका है कि केवल उन्हीं मरीजों में क्लॉट निकालने का लाभ मिलता है जहाँ ब्लीडिंग दिमाग की सतह तक पहुँच चुकी हो। अन्य मामलों में ब्लड प्रेशर नियंत्रण ही सबसे महत्वपूर्ण उपचार है।

एंडोस्कोपिक सर्जरी ने घटाया खतरा

डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने कहा कि पहले ब्रेन हेमरेज में बड़ा चीरा लगाकर सर्जरी करनी पड़ती थी, जिससे मस्तिष्क को काफी नुकसान होता था। अब मिनिमल इनवेसिव एंडोस्कोपिक तकनीक से छोटे चीरे के जरिए क्लॉट निकाला जा रहा है और परिणाम पहले से कहीं बेहतर मिल रहे हैं।

आधुनिक सीवीजे सर्जरी से सुधर रहा गर्दन का संतुलन

डॉ. अंकुर बजाज ने क्रेनियोवर्टिब्रल जंक्शन सर्जरी पर चर्चा करते हुए बताया कि गर्दन और मस्तिष्क के जुड़ाव वाले हिस्से की सर्जरी न्यूरोसर्जरी की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में शामिल है।

उन्होंने कहा कि अब आधुनिक तकनीकों की मदद से अधिकतर मामलों में पीछे की ओर से सर्जरी कर गर्दन की ऊपरी हड्डियों का संतुलन बहाल किया जा रहा है।

24 घंटे तक भी बचाई जा सकती है स्ट्रोक मरीज की जिंदगी

डॉ. दीपक कुमार सिंह ने “एंडोवैस्कुलर मैनेजमेंट ऑफ स्ट्रोक” विषय पर कहा कि मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी तकनीक से बड़े रक्त थक्कों को स्टेंट और तार की मदद से निकाला जा सकता है।

उन्होंने बताया कि यदि एमआरआई में मस्तिष्क का प्रभावित हिस्सा बचाया जा सकने योग्य हो तो 24 घंटे तक भी इस तकनीक से मरीज को सामान्य जीवन दिया जा सकता है।

बच्चों की टेढ़ी रीढ़ अब हो सकती है सीधी

डॉ. अनंत मेहरोत्रा ने पीडियाट्रिक स्कोलियोसिस पर जानकारी देते हुए कहा कि बच्चों में रीढ़ टेढ़ी होने की सर्जरी बेहद जटिल होती है।

उन्होंने बताया कि न्यूरो मॉनिटरिंग तकनीक के प्रयोग से ऑपरेशन के दौरान हाथ-पैर कमजोर पड़ने और अन्य जटिलताओं का खतरा बेहद कम हो गया है।

हाथ-पैर सुन्न हों तो तुरंत कराएं जांच

नोएडा के डॉ. अमित श्रीवास्तव ने कहा कि स्पाइनल कॉर्ड में सूजन या डैमेज होने पर हाथ-पैरों में कमजोरी, सुन्नपन और मल-मूत्र नियंत्रण की समस्या हो सकती है। ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।

स्ट्रोक मरीजों को लंबे समय तक मिर्गी की दवा देना उचित नहीं

केजीएमयू लखनऊ के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. अतुल अग्रवाल ने कहा कि स्ट्रोक के बाद कुछ मरीजों में मिर्गी के दौरे पड़ते हैं। ऐसे मरीजों को शुरुआती कुछ दिनों तक दवा देना उपयोगी है, लेकिन लंबे समय तक मिर्गी प्रतिरोधी दवाओं का प्रयोग लाभप्रद नहीं माना जाता।

स्पाइन ट्यूमर का इलाज भी अब आसान

मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली के डॉ. सुमित सिन्हा ने बताया कि आधुनिक तकनीकों के माध्यम से अब स्पाइन ट्यूमर का उपचार भी कहीं अधिक प्रभावी और सुरक्षित हो गया है।

देश भर के विशेषज्ञ रहे सहभागी

सेमिनार में एसआरएमएस आईएमएस बरेली के डॉ. प्रवीण कुमार त्रिपाठी, लखनऊ के डॉ. अचल गुप्ता, फरीदाबाद के डॉ. मुकेश पांडे, मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. गिरीश राजपाल, नोएडा के डॉ. नकुल पाहवा, डॉ. मृदुल शर्मा, फॉर्टिस हॉस्पिटल के डॉ. राहुल गुप्ता, डॉ. रमाकांत यादव, डॉ. अरुण सिंह, डॉ. कपिल सिं्घल, डॉ. उर्वशी मीणा, यथार्थ हॉस्पिटल के डॉ. मनीष गर्ग, डॉ. संजीव शर्मा, डॉ. तरुणेश शर्मा, डॉ. नीलेश गुप्ता, डॉ. राजीव बंसल, डॉ. प्रेमपाल भाटी, डॉ. गौरव धाकरे, डॉ. सजग गुप्ता, डॉ. विजयवीर सिंह, डॉ. नवनीत अग्रवाल, डॉ. एसके गुप्ता, डॉ. प्रशांत अग्रवाल, डॉ. अखिल प्रकाश शर्मा, डॉ. मुकुल पांडे, डॉ. नागेश वार्ष्णेय, डॉ. पदम चंद, डॉ. पुनीत गुप्ता, डॉ. प्रिंस अग्रवाल, डॉ. कुंज बिहारी और डॉ. आदित्य वार्ष्णेय सहित अनेक विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. मयंक बंसल, डॉ. विजयवीर और डॉ. उद्भव बंसल ने किया, जबकि क्रिस्टल प्रोजेक्ट्स के केशव गुप्ता, मनोज और योगेश ने आयोजन का सफल प्रबंधन संभाला।