आगरा। उत्तर प्रदेश के आगरा जिला अंतर्गत थाना किरावली पुलिस की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। एक संदिग्ध मोबाइल बेचने पहुंचे दो नाबालिग किशोरों को पूछताछ के नाम पर कई घंटों तक थाने के भीतर बैठाए रखने और बाद में उनसे संबंधित वीडियो व तस्वीरें सोशल मीडिया पर सार्वजनिक (वायरल) होने का एक बेहद आपत्तिजनक मामला सामने आया है। इस घटना के बाद आगरा पुलिस पर किशोर न्याय अधिनियम और बाल अधिकार कानूनों के खुले उल्लंघन के संगीन आरोप लग रहे हैं।
मोबाइल बेचने दुकान पर गए थे किशोर, दुकानदार की सूचना पर पहुंची पुलिस
यह पूरा मामला शनिवार दोपहर का बताया जा रहा है। कस्बा किरावली स्थित एक मोबाइल शॉप पर दो नाबालिग लड़के एक मोबाइल फोन बेचने के लिए पहुंचे थे। दुकान संचालक को बच्चों के हाव-भाव और मोबाइल की स्थिति संदिग्ध लगी, जिससे उसे फोन के चोरी का होने की आशंका हुई। दुकानदार ने सजगता दिखाते हुए तुरंत इसकी सूचना किरावली थाना पुलिस को दे दी। मौके पर पहुंची चीता पुलिस दोनों नाबालिग लड़कों को अपने साथ हिरासत में लेकर सीधे थाने आ गई।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस ने दोनों बच्चों को करीब दो घंटे से अधिक समय तक थाने के भीतर सामान्य अपराधियों की तरह बैठाकर पूछताछ की। बाद में कानूनी कागजी कार्रवाई के बाद उन्हें अछनेरा पुलिस को सौंप दिया गया, जहां से बच्चों को उनके परिजनों के सुपुर्द किया गया।
कानून की धज्जियां: पुलिस भूल गई ‘किशोर न्याय अधिनियम-2015’
इस पूरी प्रक्रिया में विवाद तब खड़ा हुआ जब पुलिस की कार्यप्रणाली में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम-2015 (JJ Act) के अनिवार्य प्रावधानों की घोर अनदेखी देखने को मिली।
क्या है नियम: कानूनन किसी भी नाबालिग से पूछताछ केवल सादे कपड़ों में, बेहद मित्रवत वातावरण में और अनिवार्य रूप से उनके माता-पिता या संरक्षकों की मौजूदगी में ही की जा सकती है।
बोर्ड को नहीं दी सूचना: इसके अतिरिक्त, बच्चों को हिरासत में लेते ही इसकी त्वरित सूचना ‘किशोर न्याय बोर्ड’ (Juvenile Justice Board) को देना वैधानिक रूप से अनिवार्य है, लेकिन किरावली पुलिस ने ऐसा कुछ नहीं किया।
सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल; एक्टिविस्ट्स और जेजे बोर्ड ने जताई आपत्ति
मामला तब और अधिक संवेदनशील और मानवाधिकारों का उल्लंघन बन गया, जब थाना परिसर के भीतर से ही किसी ने बच्चों की पहचान उजागर करने वाले वीडियो और तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दीं।
मशहूर चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट एडवोकेट नरेश पारस ने इस पर तीव्र आपत्ति जताते हुए कहा ”इस प्रकार किसी भी नाबालिग आरोपी या पीड़ित की तस्वीरें और पहचान सार्वजनिक करना एक गंभीर कानूनी अपराध है। इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर जीवनभर के लिए बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हैरानी की बात यह है कि थानों की पुलिस को हर महीने डीसीपी (DCP) स्तर से जेजे एक्ट का विशेष पाठ पढ़ाया जाता है, फिर भी ऐसी लापरवाही सामने आ रही है।”
वहीं, किशोर न्याय बोर्ड की अध्यक्ष जया चतुर्वेदी ने भी पुलिसिया कार्रवाई पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस पूरे मामले में थाना पुलिस द्वारा बोर्ड को कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी गई, जो नियमों का खुला उल्लंघन है। नाबालिगों से जुड़े मामलों में गोपनीयता और वैधानिक प्रक्रिया सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
एसीपी बोले— “मामला संज्ञान में नहीं, होगी कड़ी जांच”
इस पूरे मामले में जब अछनेरा के एसीपी (ACP) शैलेंद्र सिंह से बात की गई, तो उन्होंने कहा कि यह मामला अभी उनके संज्ञान में नहीं आया है। Social Media पर वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों की सत्यता की जांच कराई जाएगी और जो भी पुलिसकर्मी नियमों के उल्लंघन या लापरवाही का दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त विभागीय और वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना जमीनी स्तर पर पुलिसकर्मियों के बाल अधिकारों के प्रति अपर्याप्त प्रशिक्षण की पोल खोलती है।


