सीतापुर (उत्तर प्रदेश)। सनातन धर्म की पावन धरा पर स्थित ‘नैमिषारण्य धाम’ (नीमसार) एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र है, जिसकी महिमा तीनों लोकों में गाई जाती है। यह न केवल 51 शक्तिपीठों में से एक है, बल्कि इसे ‘पृथ्वी का आध्यात्मिक केंद्र’ भी माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वह पावन भूमि है जहाँ कलयुग का प्रभाव प्रवेश नहीं कर सका है।
जहाँ गिरा था माता सती का हृदय
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के 51 भाग किए थे, तब उनका हृदय नैमिषारण्य की इस भूमि पर गिरा था। यहाँ माँ सती ‘माँ ललिता देवी’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मान्यता है कि यहाँ माँ के दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और मन को असीम शांति मिलती है।
ललिता देवी मंदिर के रूप में जाना जाता है यह मंदिर
त्रिपुरसुंदरी, राजराजेश्वरी, श्रीमाता, श्रीमतसिंहासनेश्वरी जैसे अनेक पावन नामों से विख्यात मां ललिता देवी की पूरे भारत में बड़ी महिमा है. पुराणों में इनका वर्णन लिंग्धारिणी के नाम से आता है किंतु अब यह मंदिर ललिता देवी मंदिर के रूप में जाना जाता है.
नैमिषारण्य में यह दिव्य मंदिर सबसे प्रमुख
नैमिषारण्य में यह दिव्य मंदिर सबसे प्रमुख है जहां हर वर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. इस स्थान की महिमा के बारे में कई पुराणों में लेख मिलता है. देवी कवच में माता ललिता को हृदय की रक्षा करने वाली शक्ति कहा गया है. इसलिए इनके दर्शन और ध्यान करने से हृदय की पीड़ा शांत होती है. वासंतिक नवरात्र में मंदिर के परिसर में सैकड़ों की संख्या में भक्त जन ललिता सहस्रनाम, दुर्गा सप्तशती, देवी कवच का पाठ कर माता की आराधना करते हैं.
देवी के 108 पवित्र स्थानों में है
श्रीमद्देवी भागवत महापुराण के अनुसार, परमभागवत परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने कृष्णद्वैपायन व्यास से देवी के जाग्रत स्थानों के बारे में प्रश्न पूछा तब उन्होंने देवी के 108 पवित्र स्थानों का वर्णन किया. तब व्यास जी ने 108 शक्ति पीठों में प्रथम वाराणसी की विशालाक्षी मंदिर और दूसरे स्थान पर नैमिष की देवी लिंगधारिणी मां ललिता का नाम वर्णित किया. जिसके कारण इनकी बड़ी महिमा है.
देवीभागवत के अनुसार
वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषेलिङ्गधारिणी .
ललिता सहस्त्रनाम के अनुसार,
आदिशक्ति रमेयात्मा परमा पावनाकृति .
अनेककोटि ब्रह्मांड जननी दिव्य विग्रहः ..
अर्थात आदिशक्ति मां ललिता परम पावन आकृति के रूप में सबकी आत्मा में रमने वाली शक्ति है. देवी ने अपने दिव्य श्रीविग्रहः से करोड़ों ब्रह्मांडों को उत्पन्न किया है. इस आख्यान के अनुसार, नैमिषारण्य में मां ललिता देवी सृष्टि के निर्माण से ही निवास कर रही हैं एवं इस पुण्यभूमि पर मां ने तप किया है.
एक बार दर्शन से ही कल्याण करती हैं मां ललिता
यहां आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि माता ललिता का दर्शन मात्र कर लेने से बड़े से बड़ा संकट कट जाता है और हृदय से कामना करने पर भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है . यहां पुत्र की कामना करने पर जिनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है वो अपने बच्चे का अन्नप्राशन और मुंडन संस्कार भी करवाते हैं . यहां हर महीने की अमावस्या पर मेला लगता है जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु माता के मंदिर में शीश झुकाते हैं . इसके अलावा वासंतिक और शारदीय नवरात्रि, पूर्णिमा और अन्य धार्मिक अवसरों पर भरी भीड़ जुटती है .
चक्र तीर्थ: कलयुग से सुरक्षित पवित्र कुंड
नैमिषारण्य की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का ‘चक्र तीर्थ’ है। स्कन्द पुराण के अनुसार, ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ा था, जो इसी स्थान पर पाताल लोक में समा गया था। इसके प्रभाव से यहाँ जल की एक तीव्र धारा फूटी। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और यह स्थान आज भी कलयुग के दुष्प्रभावों से पूरी तरह मुक्त है।
ज्ञान और तप की सबसे बड़ी स्थली
नैमिषारण्य वह ऐतिहासिक भूमि है जहाँ 88 हजार ऋषि-मुनियों ने एक साथ कठोर तपस्या की थी। महर्षि वेदव्यास जी ने यहीं बैठकर चारों वेदों, 18 पुराणों और महाभारत जैसे महान ग्रंथों की रचना की थी। वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देसमों में इस धाम का विशेष महत्व है, जिसके कारण दक्षिण भारत के राज्यों—तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल से लाखों श्रद्धालु यहाँ वर्ष भर आते हैं।
नैमिषारण्य के प्रमुख दर्शनीय स्थल:
माँ ललिता देवी मंदिर: मुख्य शक्तिपीठ, जहाँ माँ सती का हृदय गिरा था।
व्यासी गद्दी: वह स्थान जहाँ महर्षि वेदव्यास ने वेदों और पुराणों का संकलन किया।
हनुमान गढ़ी: भगवान हनुमान की दुर्लभ दक्षिणमुखी बाल रूप की प्रतिमा।
श्री त्रिशक्ति धाम (बालाजी मंदिर): दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित भव्य मंदिर।
सूत गद्दी और देवपुरी: अन्य सिद्ध और प्राचीन स्थल।
नैमिषारण्य का आध्यात्मिक वातावरण न केवल धार्मिक पर्यटकों को, बल्कि शोधार्थियों और ज्ञान पिपासुओं को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। यह स्थान भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपराओं और वैदिक ज्ञान का जीवंत प्रमाण है।
कैसें पहुंचे नैमिषारण्य तीर्थ
यह धार्मिक स्थल उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित है . यह राजधानी लखनऊ से मात्र 90 किलोमीटर दूर है . यहां के नजदीकी रेलवे स्टेशन हरदोई और सीतापुर हैं, जहां से नैमिष की दूर लगभग 40 किलोमीटर है . आप बस, ट्रेन अथवा हवाई जहाज से लखनऊ तक आ सकते हैं . लखनऊ से सुबह 6 बजे शाम 5 बजे तक सरकारी बस कैसरबाग बस अड्डे से मिलती है .
साभार सहित- सोशल मीडिया, प्रभात खबर


