आगरा: अंतरराष्ट्रीय जाट दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में जाट आरक्षण के श्रेय को लेकर दिए गए एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता और जाट आरक्षण संघर्ष समिति के तत्कालीन संयोजक कुंवर शैलराज सिंह ने मुख्य वक्ता के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उत्तर प्रदेश में जाट आरक्षण का श्रेय हाथरस के सादाबाद में हुई रैली को दिया गया था।
आगरा का संघर्ष बनाम सादाबाद रैली
कुंवर शैलराज सिंह ने फेसबुक लाइव के माध्यम से कार्यक्रम को सुनने के बाद अपना पक्ष रखते हुए कहा कि यह दावा न केवल भ्रामक है, बल्कि आगरा के जाट समाज के बलिदान और संघर्ष का अपमान है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 31 दिसंबर 1999 को आगरा में जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने तत्कालीन मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता को ज्ञापन सौंपा था.
इसी ज्ञापन और आगरा के आंदोलन के दबाव में राज्य सरकार ने कैबिनेट में आरक्षण का निर्णय लिया था, जिसका उल्लेख तत्कालीन मुख्यमंत्री ने अपने बजट भाषण में भी किया था।
शैलराज सिंह के अनुसार, हाथरस, अलीगढ़ और मथुरा जैसे क्षेत्रों में उस समय कोई बड़ा आंदोलन सक्रिय नहीं था, अतः सादाबाद रैली को इसका जनक बताना ऐतिहासिक रूप से गलत है।
13 अप्रैल: शहीदी दिवस या उत्सव?
कुंवर शैलराज सिंह ने 13 अप्रैल को ‘अंतरराष्ट्रीय जाट दिवस’ के रूप में मनाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने इसके पीछे दो प्रमुख तर्क दिए:
जलियांवाला बाग का सम्मान: 13 अप्रैल 1919 का दिन जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों को समर्पित है। इस दिन को किसी उत्सव के रूप में प्रस्तुत करना शहीदों की शहादत को गौण करने जैसा है।
ऐतिहासिक आधार: उन्होंने कहा कि इस दिवस की अवधारणा (वर्ष 2015) एक विदेशी विश्वविद्यालय से जुड़ी है, जबकि भारत के संदर्भ में यह दिन ‘किसान शहीदी दिवस’ के रूप में अधिक प्रासंगिक है।
इतिहास को बचाने की अपील
वरिष्ठ अधिवक्ता ने समाज के प्रबुद्ध जनों से अपील की है कि नई पीढ़ी के सामने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश न किया जाए। उन्होंने कहा कि आगरा जनपद की जाट सरदारी हमेशा से निर्णायक भूमिका में रही है और उसके योगदान को कमतर आंकना न्यायसंगत नहीं है।

