माना अँधेरा घना है, लेकिन दिया जलाना कहाँ मना है…, साहसिक निर्णय और अद्भुत नेतृत्व – PM मोदी के राजनीतिक सफर के 25 वर्ष

अन्तर्द्वन्द

देश के प्रधानमंत्री और वैश्विक पटल पर भारत को एक गौरवशाली पहचान दिलाने वाले श्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस अवसर पर प्रख्यात चिंतक एवं विश्लेषक पूरन डावर ने अपने एक आलेख के जरिए उनके राजनीतिक सफर, साहसिक निर्णयों और प्रशासनिक क्षमता का विस्तृत विश्लेषण किया है।

आज हम देश के प्रधानमंत्री और विश्व के गौरवशाली नेतृत्व में अपनी पहचान बनाने वाले श्री नरेंद्र मोदी जी का जन्मदिन मना रहे हैं।

2012 में बैंक ऑफ इंडिया के जोनल मैनेजर श्री सिंघला जी मुझसे मिलने आए। बातचीत में मैंने पूछा, “इससे पहले आप कहाँ थे?” उन्होंने बताया कि वे लुधियाना से आए हैं और उससे पहले पाँच वर्ष गांधीनगर में रहे थे। गांधीनगर का नाम आते ही मेरी उत्सुकता बढ़ गई। मैंने तुरंत पूछा—“गुजरात मॉडल और मोदी जी की बहुत चर्चा होती है। इसमें कुछ खास है या केवल बातें हैं?”

श्री सिंघला जी का तुरंत उत्तर आया—“अगर यह व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं बना, तो देश का बड़ा दुर्भाग्य होगा।” मैं आश्चर्यचकित था, क्योंकि इससे पहले मैंने मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना के बारे में नहीं सुना था। मैंने उनसे इसका कारण पूछा। उन्होंने मोदी जी की कार्यशैली और क्षमता के बारे में बताया—तकनीक का उपयोग, निर्णय लेने की क्षमता, जनता से संपर्क और संवाद, ऑनलाइन सुझाव आमंत्रित करना और अच्छे सुझाव देने वाले लोगों को बुलाकर सहज भाव से उनकी बात सुनना और उन्हें लागू करने पर चर्चा करना।

श्री सिंघला जी भी उन लोगों में थे जिन्होंने ऑनलाइन सुझाव दिए थे। एक साधारण बैंकर को आमंत्रित किया गया और उनसे लगभग 20 मिनट तक सहजता से बातचीत हुई। यह बात मुझे बहुत प्रभावित कर गई।

2014 के लोकसभा चुनाव आने वाले थे। 2013 की शुरुआत में ही चारों ओर “मोदी, मोदी” की आवाज़ सुनाई देने लगी। मेरे सहित हर व्यक्ति और संघ-भाजपा की विचारधारा से जुड़े लोग बड़ी आतुरता से उस घोषणा की प्रतीक्षा कर रहे थे कि मोदी जी को प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। एक-एक दिन भारी लगता था।

राजनीति में श्रद्धेय लालकृष्ण आडवाणी जी, मुरली मनोहर जोशी जी, सुषमा जी सहित अनेक वरिष्ठ नेता थे। संघ और जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी बनने तक इन नेताओं की बड़ी भूमिका रही थी।

यह समझना होगा कि राजनीति में भारत ही नहीं, विकसित देशों में भी पार्टी के साथ-साथ नेतृत्व को अधिक तरजीह दी जाती है। नेता का करिश्मा हमेशा से अहम रहा है। देश में नेहरू जी के बाद इंदिरा गांधी जी और फिर राजीव गांधी जी को इंदिरा जी की हत्या से उपजी सहानुभूति का लाभ मिला और उन्हें एकतरफा समर्थन मिला। उसके बाद कांग्रेस लंबे समय तक प्रभावी नेतृत्व के अभाव से जूझती रही और कोई भी दल पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना पाया।

राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद भाजपा की छवि उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी जी जैसे नेता के नेतृत्व में भाजपा सबसे बड़ा दल बनकर एनडीए की सरकार बनाने में सक्षम हुई। अटल जी के बाद लालकृष्ण आडवाणी जी साफ-सुथरी छवि वाले नेता अवश्य थे, लेकिन जातिगत समीकरण हों या अन्य कारण—जनता उन्हें उस करिश्माई नेतृत्व के रूप में नहीं देख रही थी जिसकी उस समय देश को तलाश थी।

नरेंद्र मोदी जी ने 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला। भूकंप से उबर रहे राज्य को नई दिशा देना उस समय एक बड़ी चुनौती थी। 2002, 2007 और 2012—लगातार तीन चुनावों में जनता ने उन्हें अपना विश्वास दिया। इस दौर में उन्होंने बिजली, कृषि, गाँवों और उद्योग को विकास के केंद्र में रखा। 2003 में शुरू हुई ज्योतिग्राम योजना के माध्यम से गाँवों में गैर-कृषि कार्यों के लिए नियमित बिजली पहुँचाने का प्रयास हुआ। ई-ग्राम जैसी पहल ने तकनीक को गाँवों तक ले जाने की सोच को आगे बढ़ाया।

गुजरात को निवेश और उद्योग के लिए दुनिया के सामने रखने की पहल भी इसी दौर में आकार लेने लगी। 2003 में शुरू हुआ वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन आगे चलकर निवेश, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय संवाद का बड़ा मंच बना। इन पहलों के साथ मोदी जी की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनने लगी, जो बड़े लक्ष्य तय करता है, प्रशासन को गति देता है और अपने विचारों को योजनाओं के रूप में जमीन पर उतारने का प्रयास करता है। यही गुजरात का अनुभव 2013 आते-आते उनके राष्ट्रीय नेतृत्व की मांग को और मजबूत कर रहा था।

2013 आते-आते मोदी जी के नेतृत्व के लिए पार्टी में जन-आवाज़ बन गई और पार्टी को उन्हें प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में घोषित करना पड़ा। गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद पूरा देश “वोट फॉर इंडिया” के नारे से गूँज उठा। गोवा में मोदी जी के भाषण में वेदों के मंत्रों और भारतीय दर्शन की गूँज सुनाई दी—“वसुधैव कुटुम्बकम्”, “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः।” मोदी जी में देश ही नहीं, विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता दिखाई देने लगी।

2013 में आगरा का भी सौभाग्य था कि विजय शंखनाद रैली की शुरुआत आगरा से हुई। मुझे स्वागताध्यक्ष के रूप में मंच साझा करने का अवसर मिला। मुझे उनके उस भाषण का एक-एक शब्द आज भी अक्षरशः स्मरण है।

2014 में मोदी जी पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने। संसद में प्रवेश से लेकर शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों को आमंत्रित करने तक उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया—हमें आपस में नहीं, गरीबी से लड़ना है; भारत और उसके पड़ोसियों की साझा समस्या गरीबी है। यह अलग बात है कि पड़ोसी देश जिहादी मानसिकता में उलझे रहे, जबकि भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और पड़ोसी देश आर्थिक रूप से बहुत पीछे रह गए हैं।

उनकी नेतृत्व क्षमता, साहसिक निर्णय, “सबका साथ, सबका विश्वास”, आत्मनिर्भर भारत और 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य—इन सबकी दिशा में देश तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है। महामारी के कठिन समय में भी भारत ने जिस क्षमता से चुनौतियों का सामना किया, उसका लोहा आज भारत ही नहीं, पूरा विश्व मानता है। आज 75 प्रतिशत अप्रूवल के साथ वे विश्व के अग्रणी नेताओं में गिने जाते हैं।

ऐसे परम आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को 75वें जन्मदिवस पर कोटिशः बधाई। उनके दीर्घायु और दीर्घकाल तक देश का नेतृत्व करने की कामना करता हूँ। जब तक करिश्मा है, क्षमता है और जनता की स्वीकार्यता है, तब तक रिटायरमेंट की सोच भी नहीं आनी चाहिए।

“कैसे कह दूँ कि थक गया हूँ मैं,
जाने कितनों का हौसला हूँ मैं…”

–चिंतक एवं विश्लेषक पूरन डावर