सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: सोशल मीडिया बना ‘खतरा’, लेकिन मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं, IT नियम पर नोटिस जारी

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​नई दिल्ली। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम-2023 के विवादास्पद ‘रूल-3’ को लेकर कानूनी लड़ाई अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई की, जिसमें हाईकोर्ट ने सरकार की ‘फैक्ट चेक यूनिट’ (FCU) बनाने की शक्ति को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। कोर्ट ने इस मामले में स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया सहित अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा है।

​हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

​केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए उस पर रोक लगाने की मांग की थी। सरकार का तर्क है कि सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचनाओं और फेक न्यूज को रोकने के लिए ये नियम अनिवार्य हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। मामले की संवेदनशीलता और संवैधानिक महत्व को देखते हुए कोर्ट ने इसे तीन जजों की बेंच को सौंपने का निर्णय लिया है।

​CJI सूर्यकांत की चिंता: “सोशल मीडिया अब खतरनाक हो गया है”

​सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने टिप्पणी की कि वर्तमान में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म काफी खतरनाक मोड़ पर हैं, जहां भारतीय सेना जैसी संस्थाओं के बारे में भी गलत जानकारी फैलाई जा रही है। CJI ने स्पष्ट किया कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है, जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी (मौलिक अधिकार) और कानूनी नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

​क्या था बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख?

​इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने कुणाल कामरा और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आईटी नियमों के इस संशोधन को ‘सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के मूल ढांचे’ के खिलाफ बताया था। हाईकोर्ट का मानना था कि सरकार को ही यह तय करने का अधिकार देना कि क्या ‘सच’ है और क्या ‘झूठ’, नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।