हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह की अमावस्या का विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में 17 अप्रैल को यह पावन तिथि मनाई जाएगी। उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसे ‘सतुवाई अमावस्या’ या ‘सतुआ अमावस्या’ के नाम से जाना जाता है। यह दिन न केवल पितरों के तर्पण के लिए फलदायी है, बल्कि भीषण गर्मी की शुरुआत में शरीर को स्वस्थ रखने का एक प्राचीन ‘हेल्थ अलर्ट’ भी है।
क्यों कहलाती है यह ‘सतुवाई अमावस्या’?
इस तिथि का नाम ‘सत्तू’ (भुने हुए चने या जौ का आटा) के कारण पड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख के महीने में सूर्य की तपिश बढ़ जाती है, ऐसे में सत्तू का दान और सेवन शीतलता प्रदान करता है।
धार्मिक कारण: इस दिन सत्तू, जल से भरे घड़े, ककड़ी और चने का दान करना अक्षय पुण्य प्रदान करता है।
परंपरा: कई क्षेत्रों में इस दिन से ही सत्तू और कच्चे आम का पना पीना शुरू करने की परंपरा है।
स्नान और पितृ तर्पण की विधि
सतुवाई अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान का विशेष विधान है:
गंगा स्नान: संभव हो तो गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें।
घर पर विकल्प: यदि नदी पर न जा सकें, तो नहाने के पानी में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें।
सूर्य अर्घ्य: स्नान के पश्चात तांबे के लोटे में जल और तिल भरकर भगवान भास्कर को अर्घ्य दें।
पितृ कार्य: इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण और धूप-दीप करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।
सत्तू: चिलचिलाती धूप का ‘भारतीय सुपरफूड’
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही सत्तू को गर्मियों के लिए ‘पावरहाउस’ मानते हैं।
प्राकृतिक कूलेंट: सत्तू की तासीर ठंडी होती है, जो लू (Heatstroke) से बचाती है और पेट को हाइड्रेटेड रखती है।
पोषक तत्वों का खजाना: इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, आयरन और कैल्शियम होता है।
पाचन और शुगर: यह पचने में बेहद आसान है और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के साथ-साथ वजन घटाने में भी सहायक है।
सतुवाई अमावस्या पर क्या करें दान?
इस दिन दान की वस्तुएं ऐसी होनी चाहिए जो गर्मी में राहत प्रदान करें
सत्तू और गुड़, मिट्टी का घड़ा (जल भरकर), ककड़ी, खरबूजा और मौसमी फल, काले तिल और वस्त्र का दान करना चाहिए।
वैशाख अमावस्या को कई स्थानों पर ‘दर्श अमावस्या’ भी कहा जाता है। यह दिन नई शुरुआत और दान-पुण्य के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर है।

