यूपी 2027 चुनाव से पहले धर्म और सियासत का नया चक्रव्यूह; धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर अखिलेश आक्रामक, क्या भाजपा के एजेंडे में उलझ रही सपा?

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात बिछने के साथ ही धर्म और राजनीति का पुराना समीकरण एक बार फिर मुख्यधारा के विमर्श में आ गया है। इस बार इस सियासी घमासान के केंद्र में बागेश्वर धाम के चर्चित कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं।

भगवान श्रीकृष्ण को लेकर धीरेंद्र शास्त्री की हालिया टिप्पणियों पर अखिलेश यादव ने जिस आक्रामक अंदाज में मोर्चा खोला है, उसने सूबे की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या अखिलेश वास्तव में सनातन और यदुवंशियों की धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए आवाज उठा रहे हैं, या फिर वे जाने-अनजाने भाजपा के उसी मुफीद राजनीतिक मैदान में कदम रख रहे हैं, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले से उनका इंतजार कर रहे हैं?

धीरेंद्र शास्त्री की विवादित टिप्पणी से भड़का विवाद

विवाद की शुरुआत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के उस वायरल वीडियो से हुई, जिसमें उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा और भगवान श्रीराम की समभंग (सीधे खड़े होने वाली) मुद्रा की तुलनात्मक व्याख्या की थी। इसके बाद भगवान श्रीराम के पिता राजा दशरथ को लेकर भी उनकी एक टिप्पणी सामने आई, जिस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। चौतरफा आलोचना के बाद यद्यपि शास्त्री ने अपनी सफाई पेश की और भावनाओं को ठेस पहुंचने पर खेद व्यक्त किया, लेकिन तब तक यह मामला पूरी तरह सियासी तूल पकड़ चुका था।

​अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लेते हुए धीरेंद्र शास्त्री के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की। उन्होंने कहा कि कथावाचक ने यदुवंशियों (भगवान श्रीकृष्ण के वंशज) और रघुवंशियों (भगवान श्रीराम के वंशज) दोनों की धार्मिक मान्यताओं और सम्मान को ठेस पहुंचाई है।

अखिलेश ने यहां तक मांग कर डाली कि शास्त्री के ब्रज और अवध क्षेत्र में प्रवेश पर पाबंदी लगाई जाए तथा प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन उनके आगामी सभी कथा आयोजनों की अनुमति रद्द करे।

​क्या भाजपा के धार्मिक एजेंडे में उलझ रहे हैं अखिलेश?

धार्मिक आयोजनों में जुटने वाली अपार भीड़ को देखते हुए सपा नेतृत्व को संभवतः यह अंदेशा है कि चुनाव से पूर्व ऐसे आयोजनों के जरिए भाजपा के पक्ष में एकतरफा धार्मिक ध्रुवीकरण का माहौल बन सकता है। अखिलेश की रणनीति यह प्रतीत होती है कि भाजपा का हिंदुत्व और सनातन विमर्श पर एकाधिकार न रहे और यह संदेश जाए कि सपा भी भगवान श्रीकृष्ण की आस्था और सनातन परंपराओं के सम्मान में उतनी ही तत्पर है।

​हालाँकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सपा के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंबे समय से अखिलेश यादव को श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) के संवेदनशील मुद्दे पर घेरते रहे हैं। सीएम योगी का सीधा तर्क रहा है कि खुद को यदुवंशी बताने वाले अखिलेश यादव आखिर मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि के विषय पर अपना स्पष्ट पक्ष क्यों नहीं रखते? ऐसे में धीरेंद्र शास्त्री के विरोध के बहाने भाजपा एक बार फिर अखिलेश से पूछ सकती है कि अगर उन्हें श्रीकृष्ण के अपमान की इतनी चिंता है, तो जन्मभूमि विवाद पर उनका रुख क्या है?

​राजा भैया का कुंडा आयोजन और विस्तृत विरोध का दायरा

​इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का एक और अहम पहलू प्रतापगढ़ के कुंडा में प्रस्तावित धीरेंद्र शास्त्री का आगामी कथा आयोजन है। जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के अध्यक्ष रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया द्वारा 17 से 19 नवंबर तक आयोजित इस कार्यक्रम को लेकर अखिलेश यादव की तीखी आपत्ति ने मामले को और हवा दे दी है। अखिलेश ने केवल कुंडा ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में धीरेंद्र शास्त्री के आयोजनों पर प्रशासनिक रोक लगाने की वकालत की है, जिससे यह लड़ाई व्यक्तिगत विरोध से आगे बढ़कर बड़े राजनीतिक प्रभाव की जंग बन गई है।

​2027 के चुनावी महासंग्राम में जहां भाजपा हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी मुख्य ढाल बनाएगी, वहीं सपा के सामने अपनी पारंपरिक ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति और धार्मिक आस्था के इन नए सवालों के बीच संतुलन बनाए रखने की कड़ी परीक्षा होगी।