अद्भुत है टेसू-झेंझीं की लोक कथा, बृजभूमि से निकल कर सम्पूर्ण देश में पहुंच गई थी ये परंपरा

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मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को मांगे दही-बड़ा। जब यह पंक्तियां गूंजती है तो सभी के गहन में उनके बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं कि किस तरह से बचपन में टेसू और झेंझी के साथ खेला करते थे। बचपन की यादों में शुमार टेसू-झांझी उत्सव की यह पंक्तियां अब विलुप्त होने लगी हैं लेकिन मूर्तिकार और पुरानी परंपराओं को निभाने वाले लोगों ने आज भी इस परंपरा को जारी रखा हुआ है। इस बार बाजारों में टेसू और झेंझीं की बिक्री ठीक-ठाक हो रही है जिससे मूर्तिकार काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं। आगरा के नामनेर में कई दशकों से मूर्तिकार टेसू और झेंझीं बेचते चले आ रहे हैं।

भारतीय पंचांग में दर्ज हर तारीख किसी त्यौहार, किसी परम्परा या किसी विशेष दिन का इशारा करती है। इसीलिए हमारा देश त्योहारों का देश कहा जाता है। त्योहार और परंपराएं भी हमारे देश की संस्कृति को जीवंत रखती हैं। ब्रज क्षेत्र में मनाया जाने वाला “टेसू झेंझी” का विवाह भी एक त्यौहार और परम्परा से कम नहीं है। यह परंपरा हर वर्ष बच्चों द्वारा शरद नवरात्रि की नवमी से लेकर शरद पूर्णमासी तक निभाई जाती है। टेसू झेंझी के विवाह की तैयारियों में ग्रामीण क्षेत्र में पल बढ़ रहे बच्चे जुट गये हैं।

अद्भुत है टेसू – झेंझीं की लोक कथा

यह तो किसी को नहीं मालूम कि टेसू और झेंझीं के विवाह की लोक परंपरा कब से पड़ी पर यह अनोखी, लोकरंजक और अद्भुद है। यह परंपरा बृजभूमि को अलग पहचान दिलाती है जो बृजभूमि से सारे उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड तक गांव गांव तक पहुंच गई थी। जो अब आधुनिकता के चक्कर में और बड़े होने के भ्रम में भुला दी गई है।

इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह परंपरा महाभारत के बीत जाने के बाद प्रारम्भ हुई क्योंकि यह लोकजीवन में प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित हुई थी। इसलिए यह इस समाज की सरलता और महानता प्रदर्शित करती है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो युद्ध के दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई। यह महा पराक्रमी भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की कहानी है जो टेसू के रूप में मनाई जाती है।

नामनेर में खूब बिक रहे हैं टेसू – झेंझी

ताजनगरी के बाजारों में टेसू और झेंझीं की खूब बिक्री होती है। इस बार भी नामनेर के मूर्ति कारों ने बड़े पैमाने पर टेसू और झेंझीं को बाजारों में उतारा है। ₹30 से लेकर ₹120 तक के तेजू खूब बिक रहे हैं जिन्हें मूर्तिकारों ने अद्भुत तरीके से बनाया और सजाया है तो वहीं जैन जी भी ₹10 से लेकर ₹80 तक की बाजार में मौजूद हैं। मूर्तिकारों का कहना है कि बिक्री तो हो रही है लेकिन इस बार थोड़ा बाजार फीका दिखाई दे रहा है। अभी शुरुआत है। शरद पूर्णिमा तक झेंझी और टेसू की खूब बिक्री हो जाएगी

टोलियां बना कर निकलते हैं बच्चे

टेसू पर्व भारत के कई प्रदेशों में विजयदशमी (दशहरे) के दूसरे दिन एकादशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में टेसू और झेंझी का पर्व मनाया जाता है और गीत गाए जाते हैं। गाँवों, कस्बों में शाम होते ही चाँद के निकलने के साथ बच्चों की टोलियाँ टेसू गीत गाते हुए निकल पड़ती हैं। बालिकाएँ सिर पर मिट्टी का छोटा घड़ा या करवा, जिसमें करीब एक दर्जन छेद होते हैं, जिसे कहीं झुँझिया तो कहीं झाँझी कहा जाता है, लेकर निकलती हैं। झुँझिया के भीतर कड़वे तेल का दीपक जलाकर रखा जाता है। लड़कियाँ नाचते-गाते झुँझिया गीत गाते हुए निकलती हैं।

टेसू की तरह झुँझिया भी घर-घर जाती है और मंगल गीत गाए जाते हैं। चाँदनी रात में गाँव के खुले स्थान पर गाँव भर के बड़े-बूढ़े, बच्चे व लड़कियाँ इकट्ठा होते हैं, जहाँ पर टेसू राजा व झुँझिया रानी का विवाह कराया जाता है और रात में ही उन्हें गणेश प्रतिमाओं की तरह गंगा में विसर्जित कर दिया जाता है।

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