​कोलंबो में भारत-श्रीलंका संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय मंथन, साझी संस्कृति और बौद्ध दर्शन पर हुई गहन चर्चा

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कोलंबो, श्रीलंका। स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र, भारतीय दूतावास, श्रीलंका; डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा तथा श्रीलंका हिंदी मित्र मंडल के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारत एवं श्रीलंका : सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र, कोलंबो में किया गया। संगोष्ठी में भारत और श्रीलंका के बीच ऐतिहासिक, धार्मिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने, बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता तथा दोनों देशों की साझा विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर विचार-विमर्श हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ भारतीय परंपरा के अनुरूप अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर भारतीय दूतावास, कोलंबो के प्रथम सचिव (ईएंडसी) सौरभ सभलोक मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशु रानी विशिष्ट अतिथि रहीं। पद्मश्री प्रो. उषा यादव, केलणिय विश्वविद्यालय, श्रीलंका के पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. लक्ष्मण सेनेविरत्न अतिथि वक्ता के रूप में शामिल हुए।

संगोष्ठी के संयोजक एवं विश्वविद्यालय के केएमआई निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर, बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय की प्रवक्ता डॉ. निरोषा सल्वतुर तथा स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र की शिक्षिका एवं श्रीलंका संयोजक अतिला कोतलावल ने आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मां सरस्वती की वंदना प्रो. शंपा चौधरी और प्रो. जया शर्मा ने प्रस्तुत की। इसके बाद प्रो. प्रदीप श्रीधर ने विषय प्रवर्तन करते हुए भारत और श्रीलंका के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा समकालीन संदर्भों को रेखांकित किया। उन्होंने संगोष्ठी को दोनों देशों के शिक्षाविदों, साहित्यकारों और शोधकर्ताओं के बीच ज्ञान एवं अनुभव साझा करने का महत्वपूर्ण मंच बताया।

मुख्य अतिथि भारतीय दूतावास, कोलंबो के प्रथम सचिव (ईएंडसी) सौरभ सभलोक ने अपने संबोधन में कहा कि भारत और श्रीलंका की जुड़वा सभ्यता हैं। दोनों देशों के वर्तमान में संबंध सबसे उच्च स्तर पर हैं। आर्थिक या प्राकृतिक आपदा के समय भारत सबसे पहले श्रीलंका के साथ खड़ा होता है और सहायता के हाथ बढ़ाता है। तमिलनाडु से श्रीलंका तक भी जलमार्ग के माध्यम से आवागमन की सुविधा नि: शुल्क रहती है। उन्होंने बताया कि भारत और श्रीलंका का ट्रेड फ्री समझौता है। भारत के लिए श्रीलंका निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र है। अब भाषाई समझौते भी इस संबंध को और मजबूत करेगी।

विशिष्ट अतिथि प्रो. आशु रानी ने बताया कि डॉ बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय में 1500 से 2000 पांडुलिपियाँ हैं जिसमें सबसे अधिक पाली भाषा में हैं। सभी पांडुलिपियां ज्ञान भारतम एप के माध्यम से डिजिटल अपलोड की जा रही हैं। पाली भाषा की पांडुलिपियां पढ़ने के लिए श्री लंका की बुद्धिस्ट एवं पाली यूनिवर्सिटी के साथ समझौता हुआ है। इसी दिशा में आशा है कि जल्द हम हिंदी सिंघवी शोध संस्थान की स्थापना की जा सकती है।

पद्मश्री प्रो. उषा यादव ने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य और संस्कृति समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। भारत और श्रीलंका की लोकपरंपराओं, धार्मिक मान्यताओं, कथाओं और जीवन मूल्यों में अनेक समानताएं दिखाई देती हैं।

प्रो. लक्ष्मण सेनेविरत्न ने कहा कि भारत और श्रीलंका के बीच बौद्ध धर्म तथा प्राचीन ज्ञान परंपराओं का गहरा ऐतिहासिक संबंध रहा है। ये सम्बन्ध त्रेता युग से है। उन्होंने बताया कि 80 वर्ष से श्री लंका में हिंदी में पढ़ाई हो रही है। श्रीलंका के 17 विश्विद्यालय में से 9 विवि में हिदी पढ़ाई जा रही है। विगत वर्ष से श्रीलंका में श्रीलंकाई हिंदी साहित्य विकसित करने का बीड़ा उठाया गया है।

कार्यक्रम में डॉ. निरोषा सल्वतुर और अतिला कोतलावल ने आभार व्यक्त किया। तिलिनि लियनगे ने ‘कथा सोलह शृंगार’ विषय पर कथक नृत्य की प्रस्तुति दी। भारतीय प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि सौरभ सभलोक के कर-कमलों से सम्मान पत्र वितरित किए गए। नूतन अग्रवाल ने एक किनारे भारत जिसके दूजे लंका की सीमा…. पंक्तियों से भारत श्रीलंका के रिश्तों का काव्यबद्ध किया। हिंदी साहित्यकार कामना सिंह की पुस्तक शिव शक्ति का विमोचन किया गया।

तकनीकी सत्र में बौद्ध दर्शन, नारी जीवन और संगीत परंपराओं पर चर्चा

संगोष्ठी के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता सबरागामुवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रो. संगीत रत्नायक ने की। सत्र का संचालन श्री कृष्ण ने किया। इसमें भारत और श्रीलंका के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों के विभिन्न आयामों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

राजकीय महाविद्यालय, आगरा कैंट की प्राचार्य एवं हिंदी विभाग की प्रो. मनीषा, बीडी जैन कन्या महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष प्रो. मीरा अग्रवाल और इतिहास विभाग की सेवानिवृत्त अध्यक्ष डॉ. मधु वशिष्ठ, आर्य कन्या पीजी कॉलेज, हापुड़ की संगीत विभाग की प्रो. जया शर्मा, बौद्ध एवं पाली विश्वविद्यालय, श्रीलंका के भाषा निपुणता संवर्धन विभाग की डॉ. सरसी राणसिंह, होमागम महिन्द राजपक्ष विद्यालय की हिंदी शिक्षिका निमेषा संदीपनी दयावंश ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. संगीत रत्नायक ने की।
कार्यक्रम के समापन पर स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र की हिंदी शिक्षिका एवं हिंदी मित्र मंडल की सचिव अमानी विक्रमारच्ची ने आभार व्यक्त किया।