स्ट्रोक के बाद ‘अधूरा जीवन’ जीने को मजबूर मरीज: अस्पताल से छुट्टी के बाद शुरू होती है असली जंग, बीमा कवर न होना बनी बड़ी बाधा

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मुंबई (अनिल बेदाग): भारत में स्ट्रोक (मस्तिष्क का दौरा) अब केवल एक तात्कालिक मेडिकल इमरजेंसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक लंबी और कष्टदायक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रहा है। अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों के चलते अब मरीजों की जान बचाना तो आसान हो गया है, लेकिन अस्पताल की दहलीज पार करते ही परिवार के सामने ‘न्यूरो-रिहैबिलिटेशन’ का पहाड़ जैसा खर्च खड़ा हो जाता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि स्ट्रोक के बाद रिकवरी के लिए जरूरी यह महत्वपूर्ण इलाज आज भी अधिकांश स्वास्थ्य बीमा (Insurance) पॉलिसियों के दायरे से बाहर है, जो मरीजों को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ देता है।

​सिर्फ जान बचाना काफी नहीं, पुनर्वास भी जरूरी

मुंबई सहित देशभर में स्ट्रोक के ग्राफ में चिंताजनक उछाल आया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि चिकित्सा जगत का लक्ष्य केवल मरीज की सांसें बचाना नहीं, बल्कि उसे आत्मनिर्भर बनाकर सामान्य जीवन में वापस लाना होना चाहिए। इंडियन फेडरेशन ऑफ न्यूरोरेहैबिलिटेशन के अध्यक्ष डॉ. निर्मल सुर्या के अनुसार, “भारत में प्रतिवर्ष 12.5 लाख से अधिक स्ट्रोक के नए मामले दर्ज किए जाते हैं।

चिकित्सा सेवाओं में सुधार से मृत्यु दर तो घटी है, लेकिन पुनर्वास (Rehabilitation) सुविधाओं के अभाव में लाखों लोग आजीवन अपंगता या पराश्रित जीवन जीने को मजबूर हैं।”

बीमा कवर की कमी: परिवारों पर भारी आर्थिक चोट

न्यूरो-रिहैबिलिटेशन की प्रक्रिया जटिल और लंबी होती है। कोकिलाबेन अस्पताल, मुंबई के विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव बताते हैं कि स्ट्रोक के बाद पूरी तरह ठीक होने के लिए लगातार फिजियोथेरेपी, विशेषज्ञ निगरानी और विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। जब बीमा कंपनियां इस खर्च को वहन नहीं करतीं, तो मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए यह इलाज कराना नामुमकिन हो जाता है।

​नई तकनीक और भविष्य की राह

​रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेली-न्यूरोरेहैबिलिटेशन जैसी नई तकनीकों ने रिकवरी की उम्मीदें जरूर बढ़ाई हैं, लेकिन इनकी पहुंच अभी भी बहुत सीमित है। विशेषज्ञों का एक ही सुर में मानना है कि यदि सरकार और बीमा नियामक (IRDAI) पोस्ट-स्ट्रोक केयर को अनिवार्य बीमा कवर में शामिल करें, तो न केवल मरीजों की जीवन प्रत्याशा बढ़ेगी, बल्कि वे समाज की मुख्यधारा में लौटकर एक गरिमामय और स्वतंत्र जीवन जी सकेंगे।