इस्लामाबाद/कराची: आर्थिक बदहाली के भंवर में फंसा पाकिस्तान अब एक ऐसे मानवीय संकट की ओर बढ़ रहा है, जहाँ जनता के पास न खाने को रोटी है और न ही जान बचाने को दवा। पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध (अमेरिका-ईरान तनाव) ने ताबूत की आखिरी कील की तरह चोट पहुँचाई है। होर्मुज स्ट्रेट में बाधा और वैश्विक सप्लाई चेन टूटने से पाकिस्तान में केवल तेल-गैस ही नहीं, बल्कि जीवन रक्षक दवाओं का भी अकाल पड़ गया है।
अस्पतालों में हाहाकार, दवाओं की कीमतें आसमान पर
लाहौर, कराची और पेशावर जैसे बड़े शहरों के सरकारी अस्पतालों की हालत यह है कि वहां बुनियादी दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। पाकिस्तान केमिस्ट एंड ड्रग एसोसिएशन के मुताबिक, दवाओं के कच्चे माल (API) का आयात लगभग ठप है, जिससे शिपिंग कॉस्ट में भारी इजाफा हुआ है। हालत यह है कि बीपी और कोलेस्ट्रॉल जैसी नियमित इस्तेमाल होने वाली दवाओं के दाम पिछले दो साल में दोगुने से ज्यादा बढ़ चुके हैं। 2026 की शुरुआत के साथ ही दवाओं की कीमतों में हर 15-20 दिनों में बदलाव हो रहा है, जिससे गरीब मरीज इलाज के बजाय मौत का इंतजार करने को मजबूर हैं।
सरकार की ‘टैक्स’ वाली मार
एक तरफ जनता महंगाई से त्रस्त है, वहीं दूसरी ओर शहबाज शरीफ सरकार ने दवा उत्पादन के कच्चे माल पर 18% सामान्य सेल्स टैक्स (GST) लगाकर आग में घी डालने का काम किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की रेग्युलेटरी ढील की वजह से दवा कंपनियां मनमाने ढंग से कीमतें बढ़ा रही हैं। पाकिस्तान की 85-90% ऊर्जा जरूरतें खाड़ी देशों पर निर्भर हैं, ऐसे में तेल की कीमतों में 10% की मामूली बढ़त भी यहाँ महंगाई को 0.6% तक उछाल देती है, जो दक्षिण एशिया में सबसे संवेदनशील दर है।
युद्ध ने बिगाड़ा सारा खेल
मिडिल ईस्ट संकट के कारण पाकिस्तान का आयात बिल 300 मिलियन डॉलर प्रति सप्ताह से बढ़कर सीधा 800 मिलियन डॉलर प्रति सप्ताह पहुँच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) खाली होने की कगार पर है और पाकिस्तानी रुपया लगातार गोता लगा रहा है। एनालिस्ट्स का मानना है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी ऊर्जा के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर रहना है। अब तेल और आटा के बाद दवाओं की यह किल्लत पाकिस्तान में एक बड़े जनाक्रोश और अस्थिरता को जन्म दे सकती है।

