राजेश बहुगुणा की वार्ता में शिक्षा, अस्तित्व और मानव समझ पर चर्चा
देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘मानव शिक्षा: आवश्यकता, प्रक्रिया, उपलब्धि’ विषय पर एक वार्ता का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में वक्ता राजेश बहुगुणा ने मानव शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी और कहा कि शिक्षा केवल जानकारी नहीं, बल्कि समझ विकसित करने की प्रक्रिया है.
ए. नगराज और शिक्षा की अवधारणा
ए नगराज जी 1920 में कर्नाटक में पैदा हुए, उनका परिवार वैदिक परंपरा से था. राजेश बहुगुणा ने कहा कि उन्होंने धर्म ग्रन्थ पढ़ने के बाद भी कई सवालों के उत्तर ढूंढे, उनसे कहा गया कि इनका जवाब साधना से मिल सकता है. 15-20 साल साधना के बाद उन्हें समझ आया कि जो उन्हें समझ आया वह सब समझना चाहते हैं, लेकिन जिस विधि से उन्हें समझ आया, उससे कोई और नहीं समझ सकता, शिक्षा विधि से सब कुछ समझा जा सकता है. साल 1975 के बाद दो विश्वविद्यालय मानवीय शिक्षा प्रोग्राम पर चलते हैं.
मानव की जरूरत और अस्तित्व की समझ
राजेश बहुगुणा कहते हैं कि मानव की दो तरह की आवश्यकताएं होती हैं, परिस्थितिजन्य और अस्तित्वजन्य. शिक्षा मानव की अस्तित्वजन्य आवश्यकता है. वे कहते हैं कि हम आज भी तय नहीं कर पाए हैं कि मानव की शिक्षा कैसी हो, इसलिए हमें अस्तित्व को समझना होगा. अस्तित्व चार क्रियाशील अवस्थाओं से मिलकर बना है, जिसमें पदार्थ जगत, वनस्पति जगत, जीव जंतु जगत और मानव जगत शामिल हैं. वार्ता में शामिल हुए हिमांशु बहुगुणा ने कहा कि पहिए, संदूक के अविष्कार को दस हजार साल हो गए हैं, फिर भी लोग संदूक को कंधे पर ढो रहे हैं, अस्तित्व की सच्चाई को समझकर ही लोग आगे बढ़ सकते हैं.
सीखने की प्रक्रिया और मानव का लक्ष्य
राजेश बहुगुणा ने सीखने की प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि सीखना जीव जंतु जगत में शुरू होता है, जैसे शेर का बच्चा शिकार करना सीखता है. पशु जीवित रहना सीखते हैं लेकिन हमें वहां कोई शिक्षा व्यवस्था नहीं दिखती. उन्होंने कहा कि मानव का लक्ष्य जिंदा रहना नहीं है, उसे सुखी रहने के लिए समझ की जरूरत है इसलिए मानव को शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है. सुख के लिए मनुष्य के लिए अपनी पहचान जरूरी है और इसके लिए वह रूप, बल, पद, धन पर काम करता है, जिसमें शिक्षा उसकी मदद करती है. उन्होंने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि हमने कार को अपना सम्मान मान लिया है, जबकि वह मात्र सुविधा है.
शिक्षा व्यवस्था और मूल्यों का सवाल
राजेश बहुगुणा मूल्यों के सवाल पर कहते हैं कि न्याय, धर्म और सत्य सिखाने के लिए हमारे पास सिर्फ उपदेश हैं, जबकि जिंदा रहने की शिक्षा के लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था में सब कुछ है. उन्होंने कहा कि यही कारण है कि शिक्षा व्यवस्था में समझ और मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है, ताकि मनुष्य केवल जीवित ही न रहे, बल्कि समझ के साथ जीवन जी सके.

