उत्तर भारत में बढ़ा ‘ह्यूमिडिटी’ का टॉर्चर: दिल्ली-वाराणसी समेत कई शहरों में पसीने वाली गर्मी ने तोड़ा रिकॉर्ड

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नई दिल्ली। भारत में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब केवल दोपहर की तपिश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ‘कातिल रातों’ का दौर शुरू हो चुका है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की ताजा स्टडी ‘जिला स्तरीय हीट रिस्क आकलन 2025’ ने बेहद डरावने तथ्य सामने रखे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देश की 76 प्रतिशत आबादी यानी 57 प्रतिशत जिले अब भीषण गर्मी के ‘हाई रिस्क’ जोन में हैं।

​रातों की गर्मी बनी ‘साइलेंट किलर’

अध्ययन में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अब दिन के मुकाबले रातें ज्यादा खतरनाक हो रही हैं। पिछले एक दशक (2012-2022) में 70 प्रतिशत जिलों में ‘बहुत गर्म रातों’ की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। CEEW के सीईओ डॉ. अरुणाभा घोष के अनुसार, जब रात का तापमान सामान्य से ज्यादा रहता है, तो मानव शरीर को दिन की गर्मी से उबरने का समय नहीं मिलता। इससे हार्ट अटैक और हीट स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

​दिल्ली और महाराष्ट्र सबसे ज्यादा खतरे में

डेटा के अनुसार, देश के 417 जिले ‘हाई रिस्क’ कैटेगरी में हैं। इस लिस्ट में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और केरल जैसे राज्य सबसे ऊपर हैं। चिंता की बात यह है कि यह खतरा अब केवल मुंबई, दिल्ली या बेंगलुरु जैसे महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों के खेतिहर मजदूर भी इसकी सीधी जद में हैं।

​उत्तर भारत में बढ़ी ‘चिपचिपी’ गर्मी (ह्यूमिडिटी)

इंडो-गैंगेटिक मैदानी इलाकों (कानपुर, जयपुर, दिल्ली, वाराणसी) में पिछले 10 वर्षों में नमी (Relative Humidity) में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अधिक ह्यूमिडिटी के कारण शरीर का पसीना नहीं सूखता, जिससे ‘फील लाइक’ टेम्परेचर (महसूस होने वाला तापमान) असल तापमान से 3-5 डिग्री ज्यादा हो जाता है। यह स्थिति स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी जानलेवा साबित हो रही है।

​बचाव का रास्ता: जिला स्तरीय हीट एक्शन प्लान

CEEW के एक्सपर्ट डॉ. विश्वास चिताले ने जोर दिया है कि अब नेशनल लेवल पर ‘हीट एक्शन प्लान’ की जरूरत है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों ने पहल की है, लेकिन अब इसे हर जिले में अनिवार्य करना होगा। इसमें कूल रूफ, अर्ली वार्निंग सिस्टम और नेट-जीरो कूलिंग शेल्टर जैसे समाधानों को शामिल करना समय की मांग है।