दयालबाग शिक्षण संस्थान में शोध लेखन का वैश्विक विमर्श: अकादमिक नैतिकता और क्वालिटी रिसर्च पर दुनिया भर के दिग्गजों ने दिया जोर

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​आगरा। ताजनगरी के दयालबाग शिक्षण संस्थान (DEI) में बुधवार को शोध और अकादमिक लेखन की दुनिया का एक बड़ा मंच सजा। AIU-DEI-AADC के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय ‘क्षमता निर्माण कार्यशाला’ का शानदार आगाज़ हुआ। इस महाकुंभ में भारत सहित विदेशों के जाने-माने शिक्षाविदों ने शिरकत की, जिनका मुख्य फोकस इस बात पर रहा कि कैसे भारतीय शोध लेखन को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ‘एथिकल’ और ‘इम्पैक्टफुल’ बनाया जाए।

​तथ्य आधारित और निष्पक्ष शोध समय की मांग

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर सी. पटवर्धन ने दीप प्रज्वलन के साथ सत्र की शुरुआत की। उन्होंने शोधकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि एक प्रभावी रिसर्च तभी मानी जाती है जब उसकी नींव तार्किक कार्यप्रणाली और स्पष्ट समस्या निर्धारण पर टिकी हो। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि शोधार्थी को अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों (Biases) से ऊपर उठकर पूरी निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए।

​नैतिकता और ईमानदारी सर्वोपरि: प्रो. पमी दुआ

​दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की पूर्व निदेशक और वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रोफेसर पमी दुआ ने मुख्य वक्ता के तौर पर अकादमिक प्रकाशन की बारीकियों को समझाया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में प्रकाशन की अपेक्षाएं बदल गई हैं। शोध केवल डेटा का संकलन नहीं है, बल्कि यह ईमानदारी, जवाबदेही और सटीक संप्रेषण की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है।

प्रीडेटरी जर्नल्स और फंडिंग की चुनौतियों पर मंथन

​रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री (दक्षिण एशिया) के एमडी डॉ. वेंकटेश सर्वसिद्धि ने शोध जगत की कड़वी सच्चाई पर प्रकाश डाला। उन्होंने ‘प्रीडेटरी जर्नल्स’ (फर्जी शोध पत्रिकाओं) के बढ़ते प्रभाव और कम फंडिंग जैसी चुनौतियों पर चिंता जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि संख्या के बजाय नवाचार और गुणवत्ता पर ध्यान देना अब अनिवार्य हो गया है।

हाइब्रिड मोड में जुटे 159 विद्वान

कार्यक्रम संयोजक प्रोफेसर ज्योति गोगिया ने बताया कि इस कार्यशाला में नॉर्वे, यूके और भारत के विभिन्न राज्यों से 159 प्रतिभागी हाइब्रिड मोड (ऑनलाइन और ऑफलाइन) में हिस्सा ले रहे हैं। तकनीकी सत्रों में जादवपुर यूनिवर्सिटी, वेस्टर्न नॉर्वे यूनिवर्सिटी और गुजरात यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञ अपने अनुभव साझा कर रहे हैं।

​प्रोफेसर रूपाली सत्संगी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ उद्घाटन सत्र संपन्न हुआ। आयोजन को सफल बनाने में डॉ. आयुषी कुकरेजा और उनकी टीम का विशेष योगदान रहा।