आगरा। आगरा के थाना ताजगंज की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। इस बार मामला बेहद गंभीर है। थाना ताजगंज में तैनात एक उपनिरीक्षक (SI) पर गैंगस्टर सुनील राठौर से मिलीभगत, कोर्ट में गलत रिपोर्ट भेजने और धारा 82 की कार्रवाई को कागजों तक सीमित रखने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।
मामले ने तूल तब पकड़ा जब एक महिला अधिवक्ता ने सोशल मीडिया पर कई कथित सबूत वायरल किए। इन सबूतों में गैंगस्टर के साथ उपनिरीक्षक की तस्वीरें, फेसबुक पोस्ट, नोटिस चस्पा करने और तुरंत हटाने के आरोप, और गैर-जमानती वारंट के बावजूद गिरफ्तारी न होने जैसे मुद्दे शामिल हैं। वायरल सामग्री ने न सिर्फ थाना ताजगंज पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि कानून-व्यवस्था और पुलिस की निष्पक्षता पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।
गैंगस्टर संग एसआई की फोटो वायरल
सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों में थाना ताजगंज का एक उपनिरीक्षक कथित तौर पर गैंगस्टर सुनील राठौर के साथ एक शादी समारोह में नजर आ रहा है। इन तस्वीरों के सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं कि क्या पुलिसकर्मी और आरोपी के बीच निजी संबंध हैं? अगर आरोपी फरार है, तो वह खुलेआम सामाजिक कार्यक्रमों में कैसे दिख रहा है, और यदि पुलिस को उसकी मौजूदगी की जानकारी थी, तो गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि जिस आरोपी को पुलिस “क्षेत्र से बाहर” बताती रही, वही कथित तौर पर स्थानीय कार्यक्रमों और थाने के आसपास सक्रिय देखा जाता रहा।
कोर्ट में गलत रिपोर्ट भेजने का आरोप
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि उपनिरीक्षक पर कोर्ट में गलत रिपोर्ट भेजने का आरोप लगाया गया है। आरोप है कि गैंगस्टर सुनील राठौर के खिलाफ न्यायालय से जारी कार्रवाई के बावजूद पुलिस ने अदालत को यह रिपोर्ट दी कि आरोपी “बाहर” या “क्षेत्र में मौजूद नहीं” है। जबकि स्थानीय लोगों का दावा इससे बिल्कुल उलट है। उनका कहना है कि आरोपी इलाके में लगातार देखा जाता रहा है। थाने में उसकी मौजूदगी की चर्चाएं रहीं हैं। कई बार विवादों में उसका नाम सामने आता रहा है। अगर ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का माना जा सकता है।
2023 से गैर-जमानती वारंट जारी, फिर भी गिरफ्तारी नहीं
सूत्रों और वायरल दावों के मुताबिक, गैंगस्टर सुनील राठौर के खिलाफ वर्ष 2023 से गैर-जमानती वारंट जारी है। इसके बावजूद आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई। पुलिस लगातार उसे “बाहर” बताती रही है। स्थानीय स्तर पर उसके क्षेत्र में सक्रिय होने की बातें सामने आती रहीं हैं। यह स्थिति सीधे-सीधे पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाती है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि अगर किसी आरोपी के खिलाफ एनबीडब्लू लंबित हो और वह क्षेत्र में मौजूद हो, तो गिरफ्तारी न होना गंभीर प्रशासनिक और कानूनी विफलता मानी जाती है।
कार्रवाई सिर्फ फोटो तक सीमित
मामले में एक और सनसनीखेज आरोप यह है कि आरोपी के खिलाफ धारा 82 सीआरपीसी के तहत नोटिस चस्पा किया गया, लेकिन उसे तुरंत हटाने की बात सामने आई है। आरोप सीधे-सीधे संबंधित एसआई पर है कि नोटिस लगाकर औपचारिकता पूरी की गई और फिर उसे हटा दिया गया, ताकि कागजों में कार्रवाई दिखाई जा सके लेकिन वास्तविक दबाव आरोपी पर न बने। यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो इसे कानूनी प्रक्रिया से खिलवाड़, न्यायालय के आदेश की अवमानना जैसी गंभीर स्थिति और आरोपी को संरक्षण देने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
आरोपी ने खुद ‘जेल जाने’ की बात मानी
मामले में सोशल मीडिया पर वायरल एक फेसबुक पोस्ट ने भी नया मोड़ ला दिया है। दावा किया जा रहा है कि आरोपी सुनील राठौर ने खुद एक पोस्ट में “जेल जाने” या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े संदर्भ का उल्लेख कियाहै। इस पोस्ट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर आरोपी सोशल मीडिया पर सक्रिय है, तो पुलिस की निगरानी कहां है? यदि उसे न्यायिक कार्रवाई का ज्ञान है, तो क्या वह वास्तव में फरार है? क्या पुलिस के “क्षेत्र से बाहर” होने के दावे और सोशल मीडिया उपस्थिति में विरोधाभास है? यह पोस्ट अब मामले में एक महत्वपूर्ण डिजिटल संकेत के रूप में देखी जा रही है।
थाने में मौजूदगी और विवादों में नाम आने के आरोप
स्थानीय दावों ने पुलिस के आधिकारिक दावे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि आरोपी की क्षेत्र में मौजूदगी कोई रहस्य नहीं थी। उसका नाम लगातार स्थानीय विवादों में आता रहा है। यहां तक कि थाने के भीतर या आसपास मौजूदगी की चर्चाएं भी समय-समय पर होती रहीं हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अगर इनकी जांच होती है और तथ्य सामने आते हैं, तो यह मामला बेहद संवेदनशील हो सकता है।
महिला अधिवक्ता ने सोशल मीडिया पर वायरल किए कथित सबूत
पूरे विवाद को सार्वजनिक रूप से सामने लाने का श्रेय एक महिला अधिवक्ता को दिया जा रहा है, जिन्होंने सोशल मीडिया पर कथित रूप से गैंगस्टर और एसआई की तस्वीरें, न्यायिक कार्रवाई से जुड़े संदर्भ, आरोपी की सोशल मीडिया सक्रियता, धारा 82 नोटिस से जुड़े सवाल और पुलिस की भूमिका पर गंभीर टिप्पणियां साझा कीं हैं । इन वायरल पोस्ट्स के बाद मामला तेजी से चर्चा में आया और अब लोग निष्पक्ष जांच, सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल और जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
सीसीटीवी फुटेज जांच की मांग तेज
मामले में अब सीसीटीवी फुटेज की जांच की मांग भी जोर पकड़ रही है। मांग की जा रही है कि थाने के बाहर और भीतर के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाएं, संबंधित तारीखों में आरोपी की मौजूदगी की जांच हो। पुलिसकर्मियों और आरोपी के बीच संपर्क की पड़ताल की जाए।
नोटिस चस्पा करने और हटाने के घटनाक्रम की वास्तविकता सामने लाई जाए। यदि सीसीटीवी की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह मामला कई बड़े खुलासे कर सकता है।
मुख्यमंत्री से निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
मामला अब स्थानीय विवाद से आगे बढ़कर पुलिस की साख का सवाल बन गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए इन आरोपों और सबूतों के बाद अब मांग उठ रही है कि मामले की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए। संबंधित एसआई की भूमिका की विभागीय जांच हो और न्यायालय को भेजी गई रिपोर्ट की सत्यता की जांच हो। आरोपी के खिलाफ लंबित वारंट पर जवाबदेही तय की जाए और यदि मिलीभगत साबित हो, तो कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए

