आगरा: ताजनगरी के पीएस गार्डन में जारी श्री राम कथा के दौरान गुरुवार को भक्ति और जीवन दर्शन की गंगा बही। चित्रकूट धाम के जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामस्वरूपाचार्य महाराज ने श्रीराम वनगमन और केवट प्रसंग की ऐसी मार्मिक व्याख्या की कि पांडाल में मौजूद हजारों श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि “विवाद को संवाद में बदलना ही रामत्व है” और आज के दौर में परिवारों को टूटने से बचाने के लिए ‘राम नीति’ ही एकमात्र समाधान है।
केवट का चरित्र: गरीबी में भी नहीं डिगी मर्यादा
व्यासपीठ से स्वामी जी ने केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि केवट ने अत्यंत अभाव और गरीबी झेली, लेकिन न तो अपनी नीति छोड़ी और न ही प्रभु के चरणों से प्रीति। उन्होंने आज के समाज को आइना दिखाते हुए कहा, “अक्सर लोग कठिन समय में भगवान से रूठ जाते हैं, लेकिन सच्चा भक्त वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का मार्ग न त्यागे।” उन्होंने सुदामा के चरित्र का उदाहरण देते हुए कहा कि वास्तविक पूंजी बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि भक्ति का खजाना है।
दंपतियों के लिए ‘सिया-राम’ का संदेश
वर्तमान में बढ़ते पारिवारिक कलह पर चोट करते हुए स्वामी जी ने केवट प्रसंग के दोहे के माध्यम से पति-पत्नी के संबंधों की मर्यादा समझाई। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सीता जी ने प्रभु के मन की बात जानकर अपनी मुद्रिका (अंगूठी) उतारकर दी, उसी प्रकार कठिन समय में दंपतियों को एक-दूसरे का संबल बनना चाहिए। परस्पर विश्वास और समर्पण ही एक मजबूत परिवार की नींव है।
संतान मोह और राष्ट्र का भविष्य
स्वामी जी ने महाराज दशरथ और केवट के प्रेम की तुलना करते हुए एक बड़ा सामाजिक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि दशरथ का प्रेम ‘बंधनयुक्त’ था जो राम को रोकना चाहता था, जबकि केवट का प्रेम ‘निष्काम’ था जो चरणों में समर्पित था। उन्होंने अभिभावकों को नसीहत दी कि “अपने मोह के कारण बच्चों की प्रतिभा को घर की चारदीवारी में न कैद करें। बच्चे राष्ट्र के कर्णधार हैं, यदि उनके आत्मबल को कुचला गया तो राष्ट्र कमजोर होगा।” उन्होंने बच्चों को सुंदर संस्कारों से अलंकृत करने पर विशेष जोर दिया।
त्याग और कर्तव्य का मार्ग
कथा के दौरान स्वामी जी ने कहा कि श्रीराम ने राजवैभव त्यागकर वनगमन स्वीकार किया ताकि लोक कल्याण हो सके। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि केवल विचारों का समर्थन करने से परिवर्तन नहीं आएगा, बल्कि सद्विचारों को अपने आचरण में उतारना (क्रियान्वयन) अनिवार्य है। मोह का त्याग कर कर्तव्य पथ पर बढ़ना ही जीवन की सार्थकता है।
संतों और गणमान्य जनों का जमावड़ा
इस आध्यात्मिक उत्सव में महामंडलेश्वर स्वामी यति नरसिंहानंद गिरी, महामंडलेश्वर रामदास जी (ददरोआ धाम) सहित अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे। आयोजन समिति के अध्यक्ष राम सेवक शर्मा, महामंत्री धर्मेंद्र त्यागी और मुख्य यजमान शैलेंद्र विथरिया सहित आगरा के तमाम प्रमुख समाजसेवियों ने व्यासपीठ का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

