पंजाबी साहित्य में समाहित है भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ें: आरबीएस कॉलेज में ‘पंजाबी साहित्य एवं भारतीय संस्कृति’ विषय पर राष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन

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आगरा। पंजाबी साहित्य भारतीय संस्कृति की विविधता, समानता, सेवा और सदाचार की भावना को अपने भीतर समेटे हुए है। पंजाबी संस्कृति और भारतीय संस्कृति एक-दूसरे की अभिन्न अंग हैं। भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृतियों में से एक है और जीवन के प्रत्येक संस्कार में धर्म एवं मानवीय मूल्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी, लखनऊ, शब्दोत्सव फाउंडेशन एवं आरबीएस कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को आरबीएस कॉलेज के एजुकेशन विभाग में ‘पंजाबी साहित्य एवं भारतीय संस्कृति : अंतर्संबंध और संवाद’ विषय पर राष्ट्रीय गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम का शुभारंभ गुरुद्वारा गुरु का ताल से आई संगत के गुरुवाणी कीर्तन से हुआ।

मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज के प्राचार्य प्रो. गुर मोहर सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति का आरंभ धार्मिक कार्यों से होता है। बच्चे के जन्म, नामकरण, विवाह से लेकर अंतिम संस्कार तक सभी संस्कार धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं। इसी संस्कृति के मूल्यों ने हमें आज तक जीवंत रखा है।

उन्होंने कहा कि गुरुद्वारों में लंगर की परंपरा गुरु नानकदेव जी ने शुरू की थी। पंजाब की धरती पर गुरुओं ने गुरुवाणी की रचना की, जो मनुष्य को अच्छे आचरण और मानवीय मूल्यों के साथ जीवन जीने का संदेश देती है। पंजाबी साहित्य में भारतीय संस्कृति कूट-कूटकर भरी है।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कुलदीप सिंह ने कहा कि गुरु के बिना जीवन में अंधकार रहता है। भारतीय ज्ञान परंपरा एक विशाल वटवृक्ष के समान है, जिसका दर्शन गुरु ग्रंथ साहिब में मिलता है। गुरु नानकदेव जी ने परोपकार की भावना को ही वास्तविक विद्या बताया है।

उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को भयभीत नहीं होना चाहिए। जो अनहोनी होनी है, वह होकर रहेगी, फिर डरने की आवश्यकता क्यों है। उन्होंने कहा कि मिठास और विनम्रता जैसे गुणों के बिना कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में सतगुरु नहीं बन सकता।

केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रो. उमापति दीक्षित ने कहा कि पंजाबी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें छोटे-बड़े का भेद नहीं है। सभी को समान दृष्टि से देखने की भावना इसमें निहित है। उन्होंने सभी अतिथियों एवं वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी के जनसंपर्क अधिकारी अरविंद नारायण मिश्रा ने अकादमी की गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया कि पंजाबी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए समय-समय पर सेमिनार, प्रतियोगिताओं सहित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि अकादमी की ओर से इस वर्ष प्रदेश के 124 मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जाएगी।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बाबा हरिवंश, कमलदीप सिंह, पदम गौतम (जोधपुर), वंदना पाराशर (इटावा), सुनीत कौर एवं गुरुशरण कौर ने भी पंजाबी साहित्य, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े अपने विचार रखे।

कार्यक्रम समन्वयक एवं शब्दोत्सव फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. रुचि चतुर्वेदी, संयोजक प्रो. बसंत बहादुर सिंह, डॉ. वेद प्रकाश त्रिपाठी, डीजीसी अशोक चौबे, डॉ. भोजराज सिंह सहित अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।