CBSE 10वीं का रिजल्ट जारी: क्या आपकी मार्कशीट पर मिला ‘A1’ ग्रेड? समझें सीबीएसई का पेचीदा ‘रिलेटिव ग्रेडिंग’ फॉर्मूला

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नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने इस साल रिकॉर्ड समय में 10वीं कक्षा के परिणाम घोषित कर दिए हैं। जहाँ पिछले साल नतीजे 13 मई को आए थे, वहीं इस बार 15 अप्रैल 2026 को ही छात्रों का इंतजार खत्म हो गया। रिजल्ट आने के बाद अब छात्रों और अभिभावकों के बीच सबसे बड़ी चर्चा मार्कशीट पर मिलने वाले ‘ग्रेड्स’ को लेकर है।

अगर आप भी मानते हैं कि 91 से 100 नंबर लाने पर ‘A1’ मिलता है, तो आप गलत हैं। सीबीएसई का ग्रेडिंग सिस्टम उम्मीद से कहीं अधिक वैज्ञानिक और अलग है।

91-100 वाला पुराना गणित फेल!

​आमतौर पर माना जाता है कि बोर्ड ‘एब्सोल्यूट ग्रेडिंग’ (Absolute Grading) अपनाता है, जिसमें 91-100 पर A1 और 81-90 पर A2 ग्रेड तय होते हैं। लेकिन सीबीएसई इस पद्धति का उपयोग नहीं करता। सीबीएसई के करिकुलम के अनुसार, ग्रेड अंकों की किसी तय रेंज (जैसे 90% या 95%) पर निर्भर नहीं करते, बल्कि यह ‘रिलेटिव ग्रेडिंग’ (Relative Grading) सिस्टम पर आधारित होते हैं।

​क्या है ‘रिलेटिव ग्रेडिंग’ सिस्टम?

सीबीएसई का मानना है कि रिलेटिव ग्रेडिंग ज्यादा वैज्ञानिक है क्योंकि यह छात्रों की ‘मेरिट’ और उस साल के ‘कंपटीशन’ को ध्यान में रखती है। इसका गणित कुछ इस प्रकार काम करता है:

पास छात्रों की सूची: सबसे पहले बोर्ड किसी विशेष विषय (जैसे गणित या अंग्रेजी) में पास होने वाले सभी छात्रों की एक मेरिट लिस्ट तैयार करता है।

​8 बराबर हिस्से: पास हुए कुल छात्रों की इस संख्या को 8 समान भागों (भागों में 12.5% छात्र) में विभाजित किया जाता है।

टॉप 12.5% को A1: पास होने वाले छात्रों में से जो ‘टॉप 1/8’ (ऊपरी 12.5%) हिस्से में आते हैं, केवल उन्हें ही A1 ग्रेड मिलता है।

​अगले हिस्से: इसी तरह, अगले 12.5% को A2, उसके बाद वाले 12.5% को B1 ग्रेड दिया जाता है। यह प्रक्रिया ‘E’ ग्रेड तक चलती है।

पेपर कठिन हो तो भी नहीं घटेगी ग्रेड

इस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर किसी साल बोर्ड का पेपर बहुत कठिन आता है और सभी छात्रों के औसत नंबर कम हो जाते हैं, तब भी टॉपर्स को A1 ग्रेड ही मिलेगा। ‘एब्सोल्यूट ग्रेडिंग’ में कम नंबर आने पर ग्रेड गिर जाती, लेकिन ‘रिलेटिव ग्रेडिंग’ में आपकी रैंक मायने रखती है, न कि केवल आपके अंक।

यही कारण है कि कभी-कभी 92 नंबर लाने वाले छात्र को A1 मिल जाता है, तो कभी किसी कठिन विषय में 88 नंबर लाने वाला भी A1 की श्रेणी में आ सकता है। यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर है कि उस विषय में बैठने वाले बाकी छात्रों का प्रदर्शन कैसा रहा।