जीने की शिक्षा या समझ की कमी? दून लाइब्रेरी में मानव शिक्षा पर मंथन

राजेश बहुगुणा की वार्ता में शिक्षा, अस्तित्व और मानव समझ पर चर्चा देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘मानव शिक्षा: आवश्यकता, प्रक्रिया, उपलब्धि’ विषय पर एक वार्ता का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में वक्ता राजेश बहुगुणा ने मानव शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी और कहा कि शिक्षा केवल […]

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क्या Mahabharat सच में वैसा है जैसा हमें TV में दिखाया गया? Varun Gupta के नजरिए से एक नया दृष्टिकोण-PNN

क्या महाभारत सच में वैसा है जैसा टीवी में दिखाया गया? वरुण गुप्ता का नजरिया

नई दिल्ली, अप्रैल 08: महाभारत भारतीय संस्कृति का एक ऐसा आधार स्तंभ है, जिसे हम में से लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में जानता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल आज भी बना हुआ है—क्या हम वास्तव में वही Mahabharat समझते हैं, जो मूल ग्रंथों में वर्णित है, या हमारी समझ केवल टीवी धारावाहिकों […]

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शिक्षा का निजीकरण: 10 साल में बंद हुए 94 हजार सरकारी स्कूल, क्या हाशिए पर जा रहा है गरीब का बच्चा?

भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले एक दशक में लगभग 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जबकि इसी अवधि में 51 हजार से अधिक निजी स्कूल खुल गए हैं। यह स्थिति न केवल सरकारी शिक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है, बल्कि बढ़ते […]

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धधकती खाड़ी और डगमगाता पेट्रोडॉलर: ईरान-अमेरिका टकराव ने कैसे फंसाया वैश्विक अर्थव्यवस्था का पहिया?

पश्चिम एशिया में भड़की जंग ने पूरी दुनिया को अस्थिर कर दिया है। अमेरिका-इज़राइल के हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बीच तेल, सुरक्षा और परमाणु राजनीति का नया संकट खड़ा हो गया है। युद्ध का नतीजा अभी साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि इसके बाद पश्चिम एशिया की शक्ति संरचना, ऊर्जा […]

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न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा: सत्य का आईना या संस्था की गरिमा पर प्रहार?

न्यायपालिका भारत के लोकतंत्र का संरक्षक स्तंभ है, जो संविधान की रक्षा करता है और नागरिकों को न्याय का आश्वासन देता है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की सोशल साइंस किताब पर सख्त रुख अपनाते हुए छपाई, वितरण और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। किताब के ‘हमारे समाज […]

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ताज महोत्सव: वैश्विक पर्यटन का सपना या महज एक स्थानीय मेला? पुनर्विचार की ज़रुरत

आगरा: 1992 में जिस ताज महोत्सव की नींव एक दूरदर्शी सोच के साथ रखी गई थी, आज वह अपने मूल उद्देश्यों से भटकता नजर आ रहा है। कभी इसे वैश्विक मंच पर हस्तशिल्पियों और कलाकारों को प्रमोट करने के लिए परिकल्पित किया गया था, लेकिन आज यह केवल आगरा के स्थानीय निवासियों के लिए एक […]

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शास्त्रों की विकृति और जातिवाद का उदय: क्या वाकई ब्राह्मण वर्ग ही शोषण का जिम्मेदार है?

भारत का सामाजिक ढांचा प्राचीन काल से ही विविधता से भरा रहा है, जिसमें विभिन्न समुदायों ने अपने-अपने तरीकों से योगदान दिया। इस संरचना में ब्राह्मणों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है, क्योंकि वे समाज के बौद्धिक, आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों में ब्राह्मणों […]

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बजट 2026: स्टाइपेंड, सब्सिडी और टैक्स छूट; क्या सरकार ने सच में आम आदमी की मुराद पूरी कर दी या यह सिर्फ आंकड़ों का खेल है?

1 फरवरी 2026 को संसद में पेश केंद्रीय बजट 2026 ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सरकार आर्थिक अनुशासन और जनता की आकांक्षाओं के बीच संकरी राह पर चल रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भाषण की शुरुआत ही स्थिरता, निरंतरता और दीर्घकालिक विकास की सोच से की। कोई अप्रत्याशित लोकलुभावन घोषणाओं […]

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मदारी पासी, पासी समाज का गौरव (1860-1931)

पासी समाज का गौरवशाली इतिहास -अंशुल वर्मा पूर्व सांसद हरदोई

नई दिल्ली, फरवरी 07: मदारी पासी आज भी अवध के लोकगीतों और कथाओं में जीवित हैं, लेकिन मुख्यधारा इतिहास में उन्हें कम ही स्थान मिला क्योंकि राष्ट्रवादी इतिहास संभ्रांतवादी नेताओं पर केंद्रित रहा। आंदोलन ने किसान अधिकारों की बहस को मजबूत किया, जो स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों में योगदान दिया। हालांकि, इसका हिंसक स्वरूप […]

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भारतीय राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व: विविधता, प्रतिनिधित्व और प्रभाव की कहानी

भारतीय लोकतंत्र की मूल शक्ति उसकी विविधता, विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों, विचारधाराओं और समूहों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संरचना में निहित है, जहाँ विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए नेता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आकार देते हैं। इस व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में मुस्लिम समुदाय का योगदान केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि नीति-निर्माण, संगठनात्मक राजनीति, विदेश […]

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