सुपरमॉम के भ्रम से परे: आधुनिक परवरिश और माँ की बदलती भूमिका

माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन की सबसे गहरी अनुभूति है। संसार में बच्चे की पहली पहचान, पहला स्पर्श, पहला भरोसा और पहली शिक्षा माँ से ही शुरू होती है। किसी भी समाज की सभ्यता और संवेदनशीलता इस बात से आँकी जा सकती है कि वहाँ मातृत्व को कितना सम्मान और महत्व दिया जाता […]

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ममता का किला ढहा, भगवा लहर का उदय…बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत, राजनीतिक मायने और विपक्ष का संकट

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी ने 165+ सीटें जीतकर TMC के 15 वर्षीय शासन को उखाड़ फेंका। एंटी-इनकंबेंसी, घुसपैठ, भ्रष्टाचार और CAA ने मातुआ वोट एकजुट किया। ममता की ‘अजेय’ छवि टूटी, विपक्ष कमजोर। राष्ट्रीय INDIA गठबंधन प्रभावित, पूर्वी भारत में BJP विस्तार। नई सरकार विकास-कानूनव्यवस्था पर फोकस करेगी, परंतु हिंसा रोकना चुनौती। […]

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मंडल, कमंडल और मोदी युग: कैसे बदली 1977 से 2026 तक देश की राजनीतिक दिशा?

जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो उन्होंने अनजाने में भारतीय लोकतंत्र की उस नई नींव की आधारशिला रख दी थी, जिसने आने वाले पांच दशकों की राजनीति को परिभाषित करना था। 1977 का चुनाव महज एक मतदान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की बहाली का जनादेश था, जिसने मोरारजी देसाई के […]

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जीने की शिक्षा या समझ की कमी? दून लाइब्रेरी में मानव शिक्षा पर मंथन

राजेश बहुगुणा की वार्ता में शिक्षा, अस्तित्व और मानव समझ पर चर्चा देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘मानव शिक्षा: आवश्यकता, प्रक्रिया, उपलब्धि’ विषय पर एक वार्ता का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में वक्ता राजेश बहुगुणा ने मानव शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी और कहा कि शिक्षा केवल […]

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क्या Mahabharat सच में वैसा है जैसा हमें TV में दिखाया गया? Varun Gupta के नजरिए से एक नया दृष्टिकोण-PNN

क्या महाभारत सच में वैसा है जैसा टीवी में दिखाया गया? वरुण गुप्ता का नजरिया

नई दिल्ली, अप्रैल 08: महाभारत भारतीय संस्कृति का एक ऐसा आधार स्तंभ है, जिसे हम में से लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में जानता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल आज भी बना हुआ है—क्या हम वास्तव में वही Mahabharat समझते हैं, जो मूल ग्रंथों में वर्णित है, या हमारी समझ केवल टीवी धारावाहिकों […]

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शिक्षा का निजीकरण: 10 साल में बंद हुए 94 हजार सरकारी स्कूल, क्या हाशिए पर जा रहा है गरीब का बच्चा?

भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले एक दशक में लगभग 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जबकि इसी अवधि में 51 हजार से अधिक निजी स्कूल खुल गए हैं। यह स्थिति न केवल सरकारी शिक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है, बल्कि बढ़ते […]

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धधकती खाड़ी और डगमगाता पेट्रोडॉलर: ईरान-अमेरिका टकराव ने कैसे फंसाया वैश्विक अर्थव्यवस्था का पहिया?

पश्चिम एशिया में भड़की जंग ने पूरी दुनिया को अस्थिर कर दिया है। अमेरिका-इज़राइल के हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बीच तेल, सुरक्षा और परमाणु राजनीति का नया संकट खड़ा हो गया है। युद्ध का नतीजा अभी साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि इसके बाद पश्चिम एशिया की शक्ति संरचना, ऊर्जा […]

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न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा: सत्य का आईना या संस्था की गरिमा पर प्रहार?

न्यायपालिका भारत के लोकतंत्र का संरक्षक स्तंभ है, जो संविधान की रक्षा करता है और नागरिकों को न्याय का आश्वासन देता है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की सोशल साइंस किताब पर सख्त रुख अपनाते हुए छपाई, वितरण और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। किताब के ‘हमारे समाज […]

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ताज महोत्सव: वैश्विक पर्यटन का सपना या महज एक स्थानीय मेला? पुनर्विचार की ज़रुरत

आगरा: 1992 में जिस ताज महोत्सव की नींव एक दूरदर्शी सोच के साथ रखी गई थी, आज वह अपने मूल उद्देश्यों से भटकता नजर आ रहा है। कभी इसे वैश्विक मंच पर हस्तशिल्पियों और कलाकारों को प्रमोट करने के लिए परिकल्पित किया गया था, लेकिन आज यह केवल आगरा के स्थानीय निवासियों के लिए एक […]

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शास्त्रों की विकृति और जातिवाद का उदय: क्या वाकई ब्राह्मण वर्ग ही शोषण का जिम्मेदार है?

भारत का सामाजिक ढांचा प्राचीन काल से ही विविधता से भरा रहा है, जिसमें विभिन्न समुदायों ने अपने-अपने तरीकों से योगदान दिया। इस संरचना में ब्राह्मणों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है, क्योंकि वे समाज के बौद्धिक, आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। वेदों, उपनिषदों और स्मृतियों में ब्राह्मणों […]

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