लखनऊ की मेयर को बड़ा झटका: हाईकोर्ट ने सुषमा खर्कवाल के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार किए सीज

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लखनऊ। लखनऊ नगर निगम के प्रशासनिक गलियारों में उस समय भूचाल आ गया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मेयर सुषमा खर्कवाल के खिलाफ एक बेहद सख्त आदेश जारी किया। अदालत ने मेयर के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों को तत्काल प्रभाव से सीज (फ्रीज) कर दिया है। यह कार्रवाई न्यायपालिका के पूर्व आदेशों की अनदेखी और निर्वाचित पार्षद को शपथ न दिलाए जाने के मामले में की गई है।

​क्या है पूरा मामला?

यह विवाद वार्ड संख्या-73, फैजुल्लागंज से जुड़ा है। सत्र अदालत ने ललित किशोर तिवारी को इस वार्ड से पार्षद पद पर विधिवत निर्वाचित घोषित किया था। हालांकि, जीत के पांच महीने बीत जाने के बाद भी मेयर प्रशासन ने उन्हें शपथ नहीं दिलाई। इस मामले ने कानूनी रूप ले लिया और हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई।

​अदालत का ‘कठोर’ रुख

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस क़मर हसन रिज़वी की खंडपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए यह आदेश पारित किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जब तक कोर्ट के आदेश के अनुसार निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार फ्रीज रहेंगे।

गौरतलब है कि मेयर पक्ष ने इस मामले में राहत पाने के लिए पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन कहीं से भी उन्हें राहत नहीं मिल सकी। इसके बावजूद आदेश का पालन न करने पर कोर्ट ने यह कठोर कदम उठाया।

​क्या होते हैं मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार?

मेयर के अधिकारों का सीज होना नगर निगम के दैनिक कामकाज के लिए एक बड़ी चुनौती है। इन अधिकारों के तहत मेयर को ​विकास कार्यों की मंजूरी देने, वित्तीय प्रस्तावों पर निर्णय लेने, ​विभागीय नियंत्रण बनाए रखने, और नई योजनाओं की स्वीकृति देने जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने होते हैं।
​अधिकार सीज होने से बजट संबंधी फैसले, विकास कार्यों की मंजूरी और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं।

​प्रशासनिक और राजनीतिक हलचल

हाईकोर्ट के इस दुर्लभ और सख्त आदेश के बाद नगर निगम मुख्यालय में हड़कंप की स्थिति है। एक तरफ जहाँ विपक्षी दलों ने इसे प्रशासनिक विफलता और कानून के शासन की जीत बताते हुए हमला शुरू कर दिया है, वहीं शहर में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है।

कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत का यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से एक बड़ा उदाहरण (Precedent) बनेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन प्रशासन इस गतिरोध को दूर करने के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था करता है।