आगरा। दयालबाग में रविवार को शिक्षा, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों का अनोखा मेल देखने को मिला। नर्सरी एंड प्ले सेंटर, स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस और स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर का संयुक्त वार्षिकोत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बच्चों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया।
नन्हे कदमों से संस्कारों की शुरुआत
नर्सरी एंड प्ले सेंटर, जिसकी स्थापना 1941 में हुई थी, आज भी छोटे बच्चों के सर्वांगीण विकास पर जोर दे रहा है। यहां 3 से 5 वर्ष तक के बच्चों को पढ़ाई के साथ खेल, व्यायाम और नैतिक शिक्षा दी जाती है, ताकि शुरुआती उम्र से ही उनमें अनुशासन और संस्कार विकसित हों।
भाषाओं से जुड़ती विविधता
स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस की शुरुआत 1965 में तेलुगू स्कूल के रूप में हुई थी। बाद में इसका विस्तार कर कई भारतीय और विदेशी भाषाएं जोड़ी गईं। वर्तमान में यहां तमिल, तेलुगू, पंजाबी, बंगाली, उड़िया, संस्कृत, फ्रेंच और जर्मन पढ़ाई जाती हैं। दो साल का कोर्स पूरा करने पर विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र दिया जाता है। छठी से दसवीं तक के छात्र इसमें प्रवेश ले सकते हैं।
कला और संस्कृति का प्रशिक्षण
1979 में स्थापित स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर का उद्देश्य बच्चों को भारतीय परंपराओं और ललित कलाओं से जोड़ना है। दूसरी से पांचवीं कक्षा तक के छात्र यहां संगीत, नृत्य, नाटक और आर्ट-क्राफ्ट सीखते हैं। चार साल का कोर्स पूरा होने पर प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
रंगारंग प्रस्तुतियां रहीं आकर्षण
कार्यक्रम में नर्सरी के बच्चों ने अंग्रेजी गीत “O Gracious Lord You Are So Kind” प्रस्तुत किया। स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस के छात्रों ने उड़िया ऐक्शन सॉन्ग पेश कर भाषाई विविधता दिखाई। स्कूल ऑफ आर्ट एंड कल्चर के विद्यार्थियों ने भाव-नृत्य के जरिए आध्यात्मिक संदेश दिया। अंत में ‘तमन्ना’ की प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
शिक्षकों ने रखे विचार
इस मौके पर शिक्षिकाओं ने दयालबाग की शिक्षा पद्धति और बच्चों के समग्र विकास पर प्रकाश डाला। संगीत और नृत्य शिक्षकों ने बताया कि कला के माध्यम से बच्चों में आत्मविश्वास और अनुशासन विकसित होता है। नर्सरी एंड प्ले सेंटर की प्रभारी ने अपने लंबे अनुभव साझा करते हुए शुरुआती शिक्षा की अहमियत बताई।
कार्यक्रम का लाइव प्रसारण ई-सत्संग के जरिए देश-विदेश के 580 से ज्यादा केंद्रों तक पहुंचा, जिससे बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन से जुड़े।

