आगरा: जनपद के बसई जगनेर थाना क्षेत्र में दुष्कर्म के एक मामले की विवेचना पुलिस के लिए गले की फांस बनती जा रही है। थाना प्रभारी पर गंभीर आरोप लगे हैं कि उन्होंने दो आरोपितों, राहुल और रवि को गिरफ्तार करने के बाद नियमानुसार 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश करने के बजाय, करीब 15 दिनों तक थाने की अवैध हिरासत में रखा। इस प्रकरण से जुड़ी कई कथित वीडियो क्लिप्स ने पुलिस विभाग की साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
वीडियो में कबूली हिरासत की बात?
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब थाना प्रभारी धर्मेंद्र भाटी का एक कथित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह आरोपितों के 15 दिन थाने में रहने की बात स्वीकार करते हुए सुने जा सकते हैं। यद्यपि वीडियो में किसी आर्थिक लेन-देन का स्पष्ट जिक्र नहीं है, लेकिन पीड़ित पक्ष इसे सौदेबाजी का ठोस आधार मान रहा है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस मामले को लंबा खींचकर समझौते के लिए दबाव बना रही थी और जब कोर्ट में अर्जी दी गई, तब जाकर आरोपितों को जेल भेजा गया।
आर्थिक तंगी और 20 लाख की मांग
आरोपित रवि के भाई अवधेश कुमार ने मीडिया के सामने आकर सनसनीखेज खुलासे किए हैं। उनका आरोप है कि पुलिस द्वारा उनसे 20 लाख रुपये की मोटी रकम की मांग की गई। अवधेश का कहना है कि उनका परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है और एक बीघा जमीन में चार भाइयों का गुजारा होता है। ऐसे में इतनी बड़ी रकम उनके लिए असंभव है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए थाने के सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की अपील की है, जिससे हिरासत के दिनों का सच सामने आ सके।
धमकाने का सिलसिला?
गुरुवार को प्रकरण में नया मोड़ आया, जब परिजनों ने शिकायत करने के बाद अपने घर सादा वर्दी में कुछ लोगों के आने का दावा किया। परिजनों का आरोप है कि ये लोग पुलिसकर्मी थे, जिन्होंने उन्हें मामला शांत करने और बयान बदलने के लिए धमकाया। इस घटना का भी एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। परिजनों के अनुसार, सादे कपड़ों में आए लोगों ने उन्हें पुलिस से टकराव न मोल लेने की नसीहत दी, जो पुलिस की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
लखनऊ तक पहुंची मामले की गूंज
यह विवाद अब स्थानीय स्तर से ऊपर उठकर लखनऊ तक पहुंच चुका है। पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे इन सवालों ने वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि 15 दिनों की हिरासत का कानूनी आधार क्या था और क्या वाकई किसी बड़ी धनराशि की मांग की गई थी? फिलहाल, सभी की निगाहें उच्च अधिकारियों द्वारा गठित की जाने वाली संभावित जांच टीम और थाने की जनरल डायरी (GD) के रिकॉर्ड पर टिकी हैं। क्या पुलिस विभाग इस मामले में किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई करेगा या यह मामला फाइलों में दब जाएगा, यह देखने वाली बात होगी।


