लखनऊ/वाराणसी, 19 मई। देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में आयोजित एमए इतिहास की सेमेस्टर परीक्षा का एक प्रश्न अब बड़े विवाद का कारण बन गया है। सोशल साइंस फैकल्टी के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित इस परीक्षा में छात्रों से पूछा गया कि ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में किस तरह बाधा डाली? यह सवाल जैसे ही परीक्षा के बाद सामने आया, विश्वविद्यालय कैंपस से लेकर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स तक इस पर एक तीखी वैचारिक बहस शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे उच्च शिक्षा और शोधपरक अकादमिक चर्चा का एक सामान्य हिस्सा बता रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ संगठन और लोग इसे बेहद आपत्तिजनक मान रहे हैं। फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर बीएचयू प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
एमए इतिहास के पेपर में पूछा गया था यह सवाल
यह पूरा मामला काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एमए इतिहास (MA History) के चौथे सेमेस्टर की मुख्य परीक्षा से जुड़ा हुआ है। मिली जानकारी के मुताबिक, ‘आधुनिक भारत और महिलाएं’ विषय के चौथे प्रश्न पत्र के अंतर्गत छात्रों से यह विवरणात्मक सवाल पूछा गया था।
प्रश्न की मूल भाषा में छात्रों से यह विश्लेषणात्मक जवाब मांगा गया था कि ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक ढांचे ने प्राचीन भारत के कालखंड में महिलाओं की उन्नति, सामाजिक विकास और प्रगति के मार्ग में किस प्रकार से रुकावटें पैदा करने का काम किया।
चूंकि यह परीक्षा सोशल साइंस फैकल्टी के इतिहास विभाग की ओर से आधिकारिक तौर पर आयोजित की गई थी, इसलिए प्रश्न पत्र तैयार करने वाले पैनल पर भी अब उंगलियां उठने लगी हैं।
सवाल के सामने आते ही दो धड़ों में बंटा सोशल मीडिया
परीक्षा समाप्त होकर जैसे ही प्रश्न पत्र बाहर आया, यह विवादित सवाल तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया पर इसे लेकर नेटिजन्स के बीच स्पष्ट रूप से दो अलग-अलग धड़े और तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
एक पक्ष का तर्क है कि इतिहास, जेंडर स्टडीज और समाजशास्त्र जैसे विषयों में सामाजिक संरचनाओं और महिलाओं की स्थिति पर इस तरह के सवाल पूछा जाना एक सामान्य अकादमिक प्रक्रिया है।
इसके विपरीत, एक बड़े वर्ग ने इस प्रश्न की चयन प्रक्रिया, इसकी विशिष्ट शब्दावली और विषय वस्तु पर गहरी आपत्ति जताई है। उनका स्पष्ट आरोप है कि जानबूझकर चुनी गई ऐसी भाषा सामाजिक समरसता को प्रभावित कर सकती है और इससे धार्मिक व सामाजिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
बीएचयू कैंपस में भी छात्रों के बीच छिड़ी वैचारिक जंग
इस बीच, बीएचयू (BHU) कैंपस के भीतर भी यह सवाल छात्रों और शोधार्थियों के बीच लगातार चर्चा और मंथन का केंद्र बना हुआ है। विश्वविद्यालय के कई प्रगतिशील छात्रों का कहना है कि यह प्रश्न पूरी तरह से उनके निर्धारित पाठ्यक्रम, पूर्व के शोधों और इतिहास के गहरे अध्ययन का ही एक हिस्सा है, जिसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
वहीं, कैंपस के ही एक अन्य छात्र समूह का मानना है कि यदि महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर ही विमर्श करना था, तो इस सवाल को किसी विशिष्ट वर्ग को लक्षित किए बिना, अधिक मर्यादित और अलग तरीके से भी पूछा जा सकता था।
इतिहास के पन्नों में पितृसत्ता और महिलाओं के अधिकारों पर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक बहस होती रही है, यही वजह है कि अब यह प्रश्न एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी तक रहस्यमयी चुप्पी
इस पूरे संवेदनशील विवाद को लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) प्रशासन की ओर से अब तक कोई भी आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने अभी तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह सवाल एमए के अनुमोदित पाठ्यक्रम के किस विशिष्ट हिस्से के तहत और किस संदर्भ में शामिल किया गया था, और न ही इस पर उठ रहे देशव्यापी विवाद को लेकर अपनी कोई राय जाहिर की है।
बहरहाल, मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है और माना जा रहा है कि बढ़ते दबाव के बीच आने वाले समय में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस पर कोई औपचारिक वक्तव्य जारी किया जा सकता है।


