नॉर्वे के अखबार की घटिया करतूत: पीएम मोदी पर आपत्तिजनक कार्टून छाप किया नस्लीय हमला, सोशल मीडिया पर फूटा भारतीयों का गुस्सा

Exclusive

ओस्लो / नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे की आधिकारिक यात्रा के बीच वहां के एक प्रतिष्ठित अखबार की बेहद आपत्तिजनक और संकीर्ण हरकत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। नॉर्वे के प्रमुख समाचार पत्र ‘आफ्टेनपोस्टेन’ (Aftenposten) ने पीएम मोदी का एक ऐसा विवादित कार्टून प्रकाशित किया है, जिसने भारत सहित दुनिया भर में रह रहे भारतीयों के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई है।

इस रेखाचित्र में प्रधानमंत्री मोदी को एक रूढ़िवादी ‘सपेरे’ (Snake Charmer) के रूप में पेश किया गया है। कार्टून के सामने आते ही सोशल मीडिया पर नेटिजन्स का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और लोग इसे ‘नस्लभेदी’ (Racist) व ‘औपनिवेशिक और सामंतवादी मानसिकता’ का जीता-जागता सबूत बताकर इस विदेशी मीडिया हाउस को जमकर लताड़ रहे हैं।

क्या है उस विवादित स्केच में, जिसने भड़काया गुस्सा?

​यह पूरा विवाद 16 मई, 2026 को तब शुरू हुआ जब पीएम मोदी के ओस्लो की धरती पर कदम रखने से ठीक कुछ घंटे पहले यह कार्टून जारी किया गया। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट मार्विन हालेराकर (Marvin Halleraker) द्वारा बनाए गए इस स्केच में प्रधानमंत्री मोदी को जमीन पर एक पारंपरिक चटाई पर बैठे हुए दिखाया गया है। उनके हाथों में सपेरों वाली बांसुरी (पुंगी) थमाई गई है, लेकिन यहाँ ट्विस्ट यह है कि टोकरी से सांप निकलने की बजाय एक पेट्रोल पंप का पाइप निकलता हुआ दिखाया गया है। इस नस्लीय स्टीरियोटाइप को भारतीय कूटनीति पर कटाक्ष करने के उद्देश्य से बनाया गया था।

​लेख का अपमानजनक शीर्षक और धुंधली हुई तारीफ

​इस विवादित कार्टून के ठीक साथ में अखबार ने जाने-माने पत्रकार फ्रैंक रोसाविक (Frank Rossavik) का एक ओपिनियन पीस (विश्लेषणात्मक लेख) भी छापा। इस लेख का हेडिंग ही बेहद अजीब और अमर्यादित था— “एक चतुर और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी” (A clever and slightly annoying man)। हालांकि, लेखक रोसाविक ने अपने मुख्य आर्टिकल के भीतर पीएम मोदी की ‘रियलपॉलिटिक’ (व्यावहारिक और यथार्थवादी राजनीति) की प्रशंसा की थी और वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति के रूप में उभरते भारत के लोहे को स्वीकार किया था, लेकिन साथ में छपे इस बेहद घटिया और नस्लवादी कार्टून के कारण उनका पूरा सकारात्मक विश्लेषण ओझल हो गया और विवाद मुख्य धारा में आ गया।

​डिजिटल वर्ल्ड में उबाल, नॉर्वे की वामपंथी नेता ने भी उठाए सवाल

​जैसे ही यह एडिशन मार्केट में आया, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर विरोध की सुनामी आ गई। भारत के बड़े पत्रकारों से लेकर आम जनता तक ने इस पर तीखी आपत्ति दर्ज कराई।

​एनडीटीवी के न्यूज एडिटर आदित्य राज कौल ने इस कार्टून को सोशल मीडिया पर “स्तब्ध करने वाला, सीधे तौर पर नस्लभेदी और अत्यंत अपमानजनक” करार दिया।

एक अन्य एक्स (ट्विटर) यूजर ने लिखा, “यह पत्रकारिता का गिरता स्तर नहीं, बल्कि पश्चिम की पुरानी उपनिवेशवादी सोच का कीड़ा है। भारत के वैश्विक उदय को यूरोपीय मीडिया आसानी से पचा नहीं पा रहा है।”

​एक और यूजर ने तीखा व्यंग्य करते हुए लिखा, “तथाकथित ‘सबसे स्वतंत्र प्रेस’ का तमगा लेकर घूमने वाला नॉर्वे आज भी 19वीं सदी के पुराने और घिसे-पिटे विचारों में ही अटका हुआ है।”

इस मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब खुद नॉर्वे की धरती से इसके विरोध में सुर उठे। नॉर्वे की वामपंथी राजनीतिक पार्टी ‘रॉड्ट’ (Rødt) की कद्दावर नेता सोफी राणा (Sofie Rana) ने इस कार्टून को पूरी तरह से ‘रासिस्ट’ (नस्लभेदी) घोषित करते हुए अपनी ही मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया।

पहले भी दिखा था नॉर्वेजियन मीडिया का पूर्वाग्रह, राजनयिक ने दिया था करारा जवाब

​यह पहली बार नहीं है जब नॉर्वे की मीडिया ने भारत को लेकर अपनी कम समझ या पूर्वाग्रह का प्रदर्शन किया हो। इससे ठीक दो दिन पहले, यानी 18 मई को विदेश मंत्रालय की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वहां की पत्रकार हेले लिंग (Helle Lyng) ने एक टेढ़ा सवाल दागते हुए पूछा था कि “आखिर दुनिया भारत पर भरोसा क्यों करे और भारत के प्रधानमंत्री खुलकर प्रेस के तीखे सवालों के जवाब क्यों नहीं देते?”

​उस वक्त वहां मौजूद वरिष्ठ भारतीय राजनयिक सीबी जॉर्ज ने उस पत्रकार को ऐसा आईना दिखाया था जिसकी गूंज आज भी सुनाई दे रही है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा था, “मैडम, आपको भारत के विशाल लोकतंत्र और उसके व्यापक पैमाने की रत्ती भर भी समझ नहीं है। अकेले हमारे देश की राजधानी दिल्ली में 200 से ज्यादा न्यूज़ चैनल चौबीसों घंटे चलते हैं। दिक्कत यह है कि आप जैसे लोग कुछ अज्ञानी और अजेंडा चलाने वाले एनजीओ (NGOs) की मनगढ़ंत रिपोर्ट पढ़ लेते हैं और उसी के आधार पर भारत का आकलन करने की भूल कर बैठते हैं।”

​इस पूरे कूटनीतिक और मीडिया विवाद के बाद अब सोशल मीडिया पर यह विमर्श तेजी से चल रहा है कि क्या ‘नस्लभेदी सोच’ से ग्रसित यह विदेशी मीडिया पीएम मोदी के साल 2014 वाले उस ऐतिहासिक वैश्विक भाषण को भूल गई है? जहां उन्होंने पूरी दुनिया को भारत की बदलती और आधुनिक तस्वीर दिखाई थी। लोगों का कहना है कि भारत आज चांद और मंगल पर पहुंच चुका है, लेकिन यूरोपीय मीडिया का एक हिस्सा अब भी सपेरों वाले युग की बीमार मानसिकता से बाहर नहीं आ पाया है।

-मीडिया रिपोर्ट्स