आगरा। रंगमंच का पर्दा जब ऊपर उठता है, तो किसी विषय या समस्या को नाटकीय ढंग से मंचित होते देखने का सुअवसर दर्शकों को मिलता है और जब पर्दा नीचे गिरता है, तो वह दर्शकों के मन में कई झकझोरने वाले सवाल पैदा करते हुए उन्हें कुछ करने के लिए उद्वेलित कर देता है। रंगमंच की यही खासियत उसके जीवंत होने का अहसास कराती है। रंगमंच की इसी खूबी को अपने प्रभावी निर्देशन से मंच पर उतारने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी और अधिवक्ता स्व. विनय पतसरिया की आज तीसरी पुण्यतिथि है। आज ही के दिन तीन साल पहले (17 अक्टूबर 2023 को) वे रंगमंच का पर्दा हमेशा के लिए गिराकर एक समृद्ध विरासत छोड़ गए थे। दुनिया से विदाई लेने से ठीक पहले उन्होंने अपना आखिरी यादगार शो नाटक ‘गधे की बारात’ के रूप में किया था।
वह हिंदी रंगमंच पर कड़े अनुशासन, परफॉर्मेंस में परफेक्शन, कलाकारों के सटीक चयन द्वारा नाटक को इतना प्रभावशाली बना देते थे कि उनके नाटकों के शो हाउसफुल रहते थे। उन्होंने हिंदी रंगमंच पर प्रभावी मंचनों से कलाप्रेमियों के दिलों में एक खास जगह बनाई। नौजवानों को उनके व्यक्तित्व-कृतित्व से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है।
साधारण परिवार से ताल्लुक और शिक्षा
अग्रणी रंगकर्मियों में शुमार वरिष्ठ अधिवक्ता विनय पतसरिया किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह पांच जुलाई 1960 में आगरा के पुनियापाड़ा मौहल्ले स्व.चैतन्य स्वरूप शर्मा और स्व. शांति शर्मा के मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे थे। परिवार में उनके भाई स्व.विष्णु स्वरूप शर्मा, विनोद भारद्वाज, विपिन बिहारी शर्मा, बहिनें ऊषा शर्मा एवं स्व.मंजू शर्मा का बड़ा परिवार था। वर्तमान में परिवार में पत्नी डॉ. रेखा पतसरिया और दो बेटियां भी हैं। डॉ. रेखा पतसरिया आगरा कॉलेज की प्राचार्य रही हैं।
हालांकि विनय पतसरिया का पैतृक गांव मथुरा स्थित शेरगढ़ है। लेकिन उनकी जन्मस्थली और कर्मस्थली दोनों आगरा ही रहा।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा राजकीय आदर्श विद्यालय से प्राप्त की। माध्यमिक शिक्षा राजकीय इंटर कॉलेज से प्राप्त की थी। उसके बाद में उन्होंने बीए और एलएलबी आगरा कॉलेज से किया था।
आगरा कॉलेज में पढ़ते वक्त वह छात्र राजनीति से भी जुड़े रहे। आगरा कॉलेज की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में वह बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। वाकपटुता के धनी विनय पतसरिया ने वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में कॉलेज स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक प्रतिभा का परचम लहरा कर वह पुरस्कृत हुए। लॉ करने के बाद उन्होंने कुछ समय कलेक्ट्रेट में स्व. द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी के कुशल निर्देशन में प्रैक्टिस शुरू की। उसके बाद दीवानी में प्रैक्टिस करने लगे और ता-उम्र वहीं से जुड़े रहे। वहीं आगरा बार एसोसिएशन के सचिव के पद पर रहते हुए बार हॉल में लाइब्रेरी सहित कई ठोस काम अधिवक्ताओं के करवाए। लीगल कंसल्टेंट के तौर पर डाबर ग्रुप एवं शारदा ग्रुप से जुड़े थे।
रंगमंच और अभिनय का सफर
उनको हिंदी रंगमंच के पुरोधा डॉ. राम गोपाल सिंह चौहान के मार्गदर्शन में नाटकों में पहले अभिनय और बाद में निर्देशन का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ, जो बाद में उनकी खास पहचान बन गया। सन 1980 में उन्होंने रंगमंच पर अपनी शुरुआत की। उनका पहला नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’ था जिसका निर्देशन अनिल चौहान ने किया था। उसके बाद ‘कथा एक कंस की’, ‘अंधा युग’, ‘सिंहासन खाली है’, ‘नई समस्या’, ‘लॉटरी’, ‘विषपायी’, ‘खलदेवा की जय जयकार’, ‘गधे की बारात’, में प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
रंगमंच पर सशक्त अभिनय की छाप छोड़ने के बाद उन्होंने नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रखे। उन्होंने ‘मि. अभिमन्यु’ नाटक का निर्देशन किया था। उसके बाद उन्हीं नाटकों का निर्देशन भी किया, जिनमें कभी अभिनय किया करते थे। विनय पतसरिया ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे। ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम ‘सुलहकुल’ में अभिनय किया। इसके बाद खुद कई ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रमों का निर्देशन करते हुए प्रभावी प्रस्तुतिकरण किया। इनमें ‘जश्न-ए-आजादी’ कार्यक्रमों की श्रृंखला के तहत ‘ए वतन तेरे लिए’, सूरसदन प्रेक्षागृह में ‘साध्वी चंदनबाला’, ‘महावीर स्वामी’, ताजखेमा पर ‘अकबर’, ‘कृष्णा’ आदि प्रमुख हैं। वह ताज महोत्सव से भी बतौर सांस्कृतिक संयोजक जुड़े रहे थे। वह फिल्म और टेलीविजन से भी जुड़े रहे। वासु भगनानी की फिल्म ‘तेरा जादू चल गया’ में कला निर्देशक के रूप में काम किया, कृष्ण राघव के निर्देशन में दूरदर्शन के टीवी सीरियल ‘मछलीघर’और शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित ‘शेष प्रश्न’ में कला निर्देशन और अभिनय दोनों को अंजाम दिया।
मंच संचालन के बेताज बादशाह
मंच संचालन में भी उनका कोई जवाब नहीं था, उन्होंने आगरा के तमाम बड़े कार्यक्रमों में अपनी मंच संचालन से अमिट छाप छोड़ी थी। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आगरा में कार्यक्रमों में मंच संचालन के दायित्व बखूबी निभाए।
आज उनकी पुण्यतिथि पर ताजनगरी का कला जगत उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है।
लेखक-डॉ.महेश धाकड़
