आगरा: ताजनगरी के बिजली घर स्थित बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क में रविवार को सामाजिक क्रांति के अग्रदूत महात्मा ज्योतिबा राव फुले की जयंती केवल एक औपचारिकता बनकर नहीं रही, बल्कि यह आयोजन सामाजिक न्याय और अनिवार्य शिक्षा के लिए एक वैचारिक मंच बन गया। यहाँ जुटे बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक सुर में कहा कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक शिक्षा पहुँचाना ही फुले के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कार्यक्रम का आगाज महात्मा फुले के चित्र पर पुष्पांजलि और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात आयोजित विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने उस दौर को याद किया जब शिक्षा पर कुछ विशेष वर्गों का एकाधिकार था। कार्यक्रम के संयोजक अनिल सोनी ने फुले के संघर्षों को रेखांकित करते हुए कहा कि 1827 में जन्मे इस महानायक ने पहचान लिया था कि गुलामी की बेड़ियाँ केवल कलम की ताकत से ही काटी जा सकती हैं।
विरोध के कीचड़ से निकली शिक्षा की कमल
गोष्ठी में बताया गया कि जब महात्मा फुले ने वंचितों और महिलाओं के लिए स्कूल खोले, तो रूढ़िवादी समाज ने उन पर कीचड़ और पत्थर बरसाए। उन पर अपशब्दों की बौछार की गई और उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। वक्ताओं ने जोर दिया कि आज हम जिस आधुनिक शिक्षा प्रणाली का लाभ उठा रहे हैं, उसकी नींव में फुले और माता सावित्रीबाई फुले का त्याग छुपा है।
आज भी प्रासंगिक हैं फुले के आदर्श: दिनेश भारत
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं प्रदेश अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के सदस्य दिनेश भारत ने कहा कि महात्मा फुले का जीवन किसी व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि एक जीवंत आंदोलन है। उन्होंने कहा कि समानता और शिक्षा के जो बीज फुले ने बोए थे, उन्हें वटवृक्ष बनाना हमारी जिम्मेदारी है।
समाजसेवियों ने भरी हुंकार
इस अवसर पर कौशलेंद्र सिंह, अशोक कुमार और पप्पू नेताजी सहित कई गणमान्य लोगों ने संबोधित किया। वक्ताओं ने वर्तमान चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि आज भी शिक्षा और सामाजिक समानता के मोर्चे पर बहुत कुछ करना बाकी है। कार्यक्रम में जिला पंचायत सदस्य श्रीमती राजकुमारी, कीमती लाल और तेज कपूर जैसे कई प्रमुख चेहरों ने फुले के पदचिन्हों पर चलने का संकल्प दोहराया।

