जब पत्रकार की एक ‘पर्ची’ ने पिघला दिया था आशा भोसले का दिल: आगरा के उस अनसुने किस्से की याद

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आगरा: सुरों की मल्लिका आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनकी यादों के झरोखे आज भी उतने ही तरोताजा हैं। उनकी खनकती आवाज के पीछे एक बेहद सरल और भावुक हृदय छिपा था, जिसका गवाह बना था आगरा का ‘होटल ताजव्यू’। 23 जनवरी 2005 की वह दोपहर आज भी यादों में जीवंत है, जब पत्रकार आदर्श नंनद गुप्त और कुमार ललित की एक छोटी सी पर्ची ने आशा जी को प्रोटोकॉल तोड़ने पर मजबूर कर दिया था।

​दरअसल, आशा जी एक कार्यक्रम के सिलसिले में ताजनगरी आई थीं। सुरक्षा और व्यस्तता ऐसी कि आईजी, डीआईजी और कमिश्नर जैसे रसूखदार लोगों के फोन भी उन्हें मिलने के लिए राजी नहीं कर पा रहे थे। उनके पीए का स्पष्ट कहना था “आशा जी रियाज कर रही हैं, किसी से नहीं मिलेंगी।” लेकिन पत्रकारिता की जिद और आशा जी के प्रति अगाध श्रद्धा ने एक आखिरी कोशिश करने की ठानी।

15 साल की साधना और वह भावुक संदेश

​बिना साक्षात्कार लिए लौटने की निराशा के बीच आदर्श नंनद गुप्त ने अपनी डायरी से एक पन्ना निकाला और उस पर बहुत ही विनम्रता से लिखा “मुझे अनवरत सांस्कृतिक पत्रकारिता करते हुए 15 साल हो गए हैं। प्रेम की इस नगरी में पहली बार आपका पदार्पण हुआ है। यदि आज आपके दर्शन न हुए, तो मेरी यह 15 साल की पत्रकारिता की साधना अधूरी रह जाएगी। बस 5 मिनट का समय दे दीजिए।”

यह पर्ची जैसे ही आशा जी के पास पहुँची, चमत्कार हो गया। जिस कमरे के दरवाजे बड़े-बड़े अधिकारियों के लिए बंद थे, वे आदर्श नंनद गुप्त और कुमार ललित के लिए खुल गए।

5 मिनट का समय और आधे घंटे की आत्मीय गपशप

पीए की सख्त हिदायत थी कि 5 मिनट से ज्यादा समय न लिया जाए। लेकिन जैसे ही आदर्श नंनद गुप्त और कुमार ललित ने उनके चरण स्पर्श किए और बातचीत शुरू हुई, माहौल बदल गया। जब 1957 की फिल्म ‘आगरा रोड’ के गीत “सुनो सुनाएं तो तुम्हें एक छोटी सी कहानी” का जिक्र छिड़ा, तो आशा जी मानों अपनेपन के समंदर में डूब गईं।

वह 5 मिनट की मुलाकात कब 30 मिनट की लंबी गुफ्तगू में बदल गई, पता ही नहीं चला। उस दिन सुर साम्राज्ञी ने न केवल फिल्मी दुनिया के किस्से साझा किए, बल्कि अपने घर-परिवार की बातें भी एक आत्मीय अभिभावक की तरह साझा कीं। पीए बार-बार घड़ी की ओर इशारा करते रहे, लेकिन आशा जी के स्नेह का झरना बहता रहा।

आज जब आशा जी के निधन के समाचार से मन आहत है, तो आगरा की वह मुलाकात और वह ‘जादुई पर्ची’ एक अनमोल धरोहर की तरह याद आती है। आदर्श नंनद गुप्त और कुमार ललित के लिए वे पल जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गए। आशा जी का जाना संगीत जगत के एक युग का अंत है, लेकिन उनका वह वात्सल्य और प्रशंसकों के प्रति सम्मान हमेशा जीवित रहेगा।