सच्ची मित्रता में नहीं होता कोई जात-पात और भेद-भाव: परमहंस स्वामी गिरिशानंद सरस्वती ने सुनाई श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन की गाथा

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आगरा। कमला नगर स्थित अग्रवाल सेवा सदन में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें एवं अंतिम दिवस कथा व्यास परमहंस स्वामी गिरिशानंद सरस्वती ने भगवान श्रीकृष्ण एवं सुदामा चरित्र का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कथा को विराम दिया। श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता, जीवात्मा-परमात्मा के संबंध और सुदामा द्वारा भगवान को भेंट किए गए चावलों के आध्यात्मिक महत्व का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

कथा व्यास ने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता संसार के लिए निष्काम प्रेम, विश्वास और समानता का आदर्श है। सच्ची मित्रता में धन-दौलत, पद, प्रतिष्ठा और परिस्थितियों का कोई भेद नहीं होता। भगवान श्रीकृष्ण द्वारकाधीश होकर भी अपने बालसखा सुदामा को उसी प्रेम से गले लगाते हैं, जैसे गुरुकुल के दिनों में लगाते थे। यही प्रसंग हमें सिखाता है कि रिश्तों की वास्तविक संपत्ति प्रेम और अपनापन है।

उन्होंने कहा कि सुदामा निर्धन थे, लेकिन उनकी भक्ति और आत्मसम्मान अत्यंत समृद्ध था। वे भगवान श्रीकृष्ण से कुछ मांगने के उद्देश्य से द्वारका नहीं गए थे। पत्नी के आग्रह पर मित्र से मिलने पहुंचे और अपने साथ साधारण से चावल लेकर गए। भगवान ने उन चावलों को प्रेमपूर्वक स्वीकार कर यह संदेश दिया कि परमात्मा को भेंट की वस्तु का मूल्य नहीं, बल्कि भक्त के भाव का मूल्य होता है।

सुदामा द्वारा लाए गए चावलों के महत्व को समझाते हुए कथा व्यास ने कहा कि भगवान के चरणों में श्रद्धा और प्रेम से अर्पित की गई छोटी से छोटी वस्तु भी अनमोल हो जाती है। चावल भारतीय परंपरा में शुद्धता, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माने जाते हैं। सुदामा के चावल इस बात के प्रतीक हैं कि भक्त जब अपने हृदय का प्रेम भगवान को अर्पित करता है तो परमात्मा उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं।

जीवात्मा और परमात्मा के संबंध पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जीवात्मा का वास्तविक लक्ष्य परमात्मा से जुड़ना है। जिस प्रकार सुदामा और श्रीकृष्ण के बीच बाहरी परिस्थितियां कभी दूरी नहीं बना सकीं, उसी प्रकार जीव और परमात्मा का संबंध भी शाश्वत है। मनुष्य संसार की माया में उलझकर इस संबंध को भूल जाता है, लेकिन भक्ति, सत्संग और भगवान के नाम का स्मरण उसे पुनः परमात्मा से जोड़ देता है।

उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन केवल दो मित्रों की मुलाकात नहीं, बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। सुदामा के जीवन में भगवान का प्रेम यह संदेश देता है कि जो व्यक्ति निष्काम भाव से प्रभु का स्मरण करता है, उसके जीवन में परमात्मा की कृपा अवश्य बरसती है।

सुदामा के द्वारका पहुंचने का प्रसंग कथा स्थल पर अत्यंत भावुक रहा। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बालसखा सुदामा को देखा तो वे राजसी वैभव भूलकर उन्हें गले लगाने के लिए दौड़ पड़े। श्रद्धालुओं ने इस प्रसंग को भक्ति और भावनाओं के साथ सुना। श्रीकृष्ण द्वारा सुदामा के चरण धोने का प्रसंग सुनकर श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारे लगाए।

कथा व्यास ने कहा कि सुदामा चरित्र समाज को यह भी संदेश देता है कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके संस्कार, चरित्र और भावनाओं से होता है। आज आवश्यकता है कि समाज में आर्थिक एवं सामाजिक भेदभाव को समाप्त कर प्रेम, सहयोग और मानवता को बढ़ावा दिया जाए।

मनोज अग्रवाल ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का उद्देश्य केवल कथा श्रवण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से प्राप्त आध्यात्मिक संदेशों को अपने जीवन में उतारना है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं का कथा में सहभागिता और सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।

कथा के मुख्य यजमान पंकज अग्रवाल एवं आरती अग्रवाल रहे। इस अवसर पर हर्ष अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, पिंकी अग्रवाल, ऋषभ अग्रवाल, पलक अग्रवाल, विशाल अग्रवाल, पूनम अग्रवाल, चिराग अग्रवाल, सोनम अग्रवाल, हिमांशु मित्तल, रुचि मित्तल, विपुल बंसल, तन्वी बंसल, शुभम अग्रवाल, दीक्षा अग्रवाल, यश बंसल, मुस्कान बंसल, राजीव गर्ग, अर्चना गर्ग, रामकिशन अग्रवाल, सारिका अग्रवाल, लता बंसल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन रजत पांडे ने किया।