बरेली में जल जीवन मिशन के तहत 3.62 करोड़ की लागत से बनी टंकी गिरी, मलबे में दबे 7 ग्रामीण

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बरेली: उत्तर प्रदेश में जल जीवन मिशन योजना के तहत करोड़ों की लागत से बन रही पानी की टंकियां ‘शोपीस’ साबित हो रही हैं। सिद्धार्थनगर में टंकी के मुड़कर लटकने की घटना के अभी 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि बरेली में कथित भ्रष्टाचार का एक और बड़ा नमूना सामने आ गया। जिले की ग्राम पंचायत सरदार नगर में मंगलवार को एक विशालकाय पानी की टंकी अचानक तेज आवाज के साथ जमींदोज हो गई। इस हादसे ने न केवल सरकारी दावों की पोल खोल दी, बल्कि 7 ग्रामीणों को अस्पताल के बिस्तर पर पहुँचा दिया।

​बैठे-बैठे आ गई ‘आफत’: मलबे में दबे ग्रामीण

चश्मदीदों के अनुसार, रोज की तरह कुछ ग्रामीण टंकी के पास बैठकर चर्चा कर रहे थे। इसी बीच बिना किसी चेतावनी के पूरी संरचना हिलने लगी और देखते ही देखते विशालकाय टंकी मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। अफरा-तफरी के बीच स्थानीय लोगों ने खुद ही रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया और मलबे से घायलों को बाहर निकाला। घायलों में डबरू माली, डोरीलाल गुप्ता, लखपत अंसारी, ठाकुरदास मौर्य, गुड्डू चौहान, वीरपाल सिंह और नन्नू सिंह शामिल हैं। इनमें से एक की स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है।

​3.62 करोड़ का प्रोजेक्ट और 6850 लोगों की प्यास का सौदा

ग्रामीणों के अनुसार यह टंकी ‘हर घर जल’ योजना के तहत बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य करीब 6850 ग्रामीणों को पेयजल उपलब्ध कराना था। इस परियोजना का निर्माण 21 दिसंबर 2022 को ‘NCC Limited’ द्वारा शुरू किया गया था और पूरी जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश जल निगम के कंधों पर थी। लगभग 3.62 करोड़ रुपये की लागत से बनी यह टंकी बमुश्किल एक साल ही टिक पाई, जिससे निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

सांसद नीरज मौर्य ने खोला मोर्चा

घटना पर कड़ा ऐतराज जताते हुए आंवला सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है। उन्होंने सीधे तौर पर इसे जल जीवन मिशन में व्याप्त भ्रष्टाचार का परिणाम बताया। सांसद ने घोषणा की कि वे इस मुद्दे को न केवल लोकसभा में उठाएंगे, बल्कि कल होने वाली ‘दिशा’ की बैठक में भी अधिकारियों को कठघरे में खड़ा करेंगे। उन्होंने पूरी योजना की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। दूसरी ओर, जिले के प्रशासनिक अधिकारी इस बड़े हादसे पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।

​यूपी में टंकियों ने गिरने का बनाया रिकॉर्ड

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में पानी की टंकियों का धराशायी होना एक पैटर्न बन गया है। टंकियों के गिरने की फेहरिस्त बहुत लंबी है:

सीतापुर के महमूदाबाद में (मई 2025) में चुनका गांव में 5.31 करोड़ रुपये की लागत से बनी पानी की टंकी भरभराकर गिर गई थी। इसको लेकर जल जीवन मिशन के काम में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।

आगरा (जनवरी 2026): कालिंदी विहार में टैंक मात्र 5 सेकंड में ताश के पत्तों की तरह ढह गई, अंडरग्राउंड टैंक भी क्षतिग्रस्त।

महोबा (फरवरी 2026): 65 लाख रुपये की टंकी टेस्टिंग के अगले दिन ही फट गई/दरारें पड़ गईं। पानी फव्वारे की तरह बहने लगा।

लखीमपुर खीरी (अप्रैल 2025): 3.5 करोड़ रुपये की ओवरहेड टैंक ट्रायल के दौरान फट गयी थी।

कासगंज आश्रा रेजिडेंशियल कॉलोनी के लिए बनी ₹14 करोड़ की 1 लाख किलोलीटर क्षमता वाली टैंक चालू होने के कुछ महीने बाद ढह गई।

कानपुर (अप्रैल 2025): रहीम नगर/करिम नगर गांव में ₹2 करोड़ की टैंक अचानक ढह गई।

 मथुरा (जून/जुलाई 2024): कृष्णा विहार कॉलोनी में 3 साल पहले बनी 2500 किलोलीटर की ₹6 करोड़ टैंक भारी बारिश में ढह गई।

यह घटनाएं साबित करती हैं कि जब तक निर्माण और निगरानी की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जनता के टैक्स का पैसा और उनकी जान, दोनों ही दांव पर रहेंगे।