आगरा: श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन ट्रस्ट, आगरा के तत्वावधान में जैन स्थानक महावीर भवन में रविवार को वरिष्ठ नागरिक दिवस श्रद्धा और आध्यात्मिक प्रेरणा के वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर आगम ज्ञान रत्नाकर बहुश्रुत जैन संत जयमुनि जी महाराज ने उपस्थित वरिष्ठजनों को जीवन के अंतिम पड़ाव को आत्मकल्याण की दिशा में मोड़ने का आह्वान किया।
“भविष्य की ओर देखें, मृत्यु से न डरें”
मुनि श्री ने कहा, “अतीत की स्मृति केवल चिन्ता और संताप देती है, जबकि भविष्य में चिंतन और साधना का अवसर है। मृत्यु का समय निश्चित है, परंतु यदि समय रहते भगवान का सहारा लिया जाए तो जीवन की नैया पार हो सकती है।” उन्होंने बुढ़ापे को परिपक्वता का प्रतीक बताते हुए कहा कि संयम ग्रहण करने की कोई आयु नहीं होती, और प्रौढ़ावस्था में दीक्षा लेकर देव लोक की प्राप्ति संभव है।
गृहस्थ जीवन में भी संभव है आत्मकल्याण
मुनि श्री ने सात विशेष सूत्र बताए जो बिना दीक्षा के भी गृहस्थ जीवन में आत्मकल्याण की दिशा में सहायक हो सकते हैं:
1. संयम और वैराग्य में रुचि
2. मित्र-शत्रु सभी के प्रति क्षमा भाव
3. भोग-वासनाओं से दूरी
4. भौतिक आसक्ति का त्याग
5. प्राणी मात्र पर करुणा
6. अनावश्यक परिग्रह से बचाव
7. शरीर और आत्मा की भिन्नता का बोध
इन सूत्रों के पालन से मृत्यु का भय स्वतः समाप्त हो जाता है और व्यक्ति संलेखना-संथारा की भावना से जीवन को सार्थक बना सकता है।
“स्थविरता ही स्थिरता का मूल है” — पूज्य श्री आदीश मुनि जी
गुरु हनुमंत, हृदय सम्राट पूज्य श्री आदीश मुनि जी ने वरिष्ठ नागरिक दिवस को अनुभवी दिवस की संज्ञा देते हुए कहा कि शास्त्रों में बुजुर्गों को ‘स्थविर’ कहा गया है — जिनका मन, दृष्टि और विचार स्थिर हो चुका हो। उन्होंने कहा कि परिवार में बुजुर्गों को कल्पवृक्ष की भूमिका निभानी चाहिए, ताकि उनके अनुभवों से नई पीढ़ी को दिशा मिले। उन्होंने बुजुर्गों को पक्षपात से बचने, प्रेमपूर्वक व्यवहार करने और नियंत्रित भाषा अपनाने की सलाह दी।
आत्मा के ज्ञान की ओर — श्री आदित्य मुनि जी का संदेश
श्री आदित्य मुनि जी ने भगवान महावीर की जिनवाणी का स्मरण कराते हुए कहा कि दुष्कर्मों में लिप्त व्यक्ति आत्मा के ज्ञान, दर्शन और शक्ति को ढक देता है। उन्होंने घाती कर्मों के क्षय की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यही मार्ग हमें केवलज्ञान की ओर ले जाता है।
आज का जाप और त्याग
धर्मसभा के अंत में जयमुनि जी महाराज ने “श्री शीतल नाथाय नमः” का जाप करने की प्रेरणा दी और तुरई, तरबूज, तिल, पापड़ी व झूठा न खाने का त्याग दिलाया।
इस धर्मसभा में दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, अलवर, ब्यावर, अहमदगढ़ से आए धर्मप्रेमियों की उपस्थिति ने आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।

