न मंदिर न मूर्ति फिर भी राम के नाम से जीवन चला रहा ये पूरा संप्रदाय..

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छत्तीसगढ़ में महानदी के तट पर रामानामी संप्रदाय के लोग रहते हैं। 1890 में श्री रशुराम जो कि वंचित वर्ग से थे, उन्होंने अपने पूरे शरीर पर राम नाम गुदवा लिया। वर्तमान में रामनामी समुदाय की 20 से अधिक पीढियां गुजर चुकी हैं

।रामनामी संप्रदाय के मेहतर लाल टंडन 76 साल के हैं। उन्होंने अपनी कहानी बताते हुए कहा कि मैं आज से 54 साल पहले अयोध्या में ही अपने शरीर पर राम नाम लिखवाया था। तब मेरी उम्र 22 साल थी। हम रामनवमी पर अयोध्या गए थे। वहां एक पुजारी ने ही मेरे चेहरे पर राम नाम लिख दिया था। गांव आया तो पूरे शरीर पर राम नाम लिखवा लिया। जो मरते दम तक मेरे साथ रहेगा।

शुद्ध शाकाहारी है ये समाज

ये समाज संत दादू दयाल को अपना मूल पुरुष मानता है। संप्रदाय सिर्फ राम का नाम ही शरीर पर नहीं गुदवाता, बल्कि अहिंसा के रास्ते पर भी चलता है। ये न झूठ बोलते हैं, न ही मांस खाते हैं। यह राम कहानी इसी देश में बसने वाले एक संप्रदाय रामनामी की है। जिनकी पहचान महज उनके बदन पर उभरे राम के नाम सिर पर विराजते मोर मुकुट से है। इस समुदाय की विचित्रता को देखना है तो एक बार छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में होने वाले भजन मेले में जरूर शामिल हो।

पांच हजार से भी कम है इनकी आबादी

अपनी विरासत को बचाने के लिए इस समाज में यह नियम है कि दो साल के बच्चे की छाती पर राम के नाम का टैटू बन जाए। रामनामी समाज ने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कानूनन रजिस्ट्रेशन भी कराया है। ये हर पांच साल में अपने मुखिया का चुनाव करते हैं और अपने मुखिया का अनुसरण करते हैं। छत्तीसगढ़ में इनकी आबादी पांच हजार से भी कम है।

-एजेंसी

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