सुरों की मल्लिका आशा भोसले का महाप्रयाण: 93 वर्ष की आयु में संगीत के एक युग का अंत

Entertainment

​मुंबई: भारतीय संगीत जगत के आकाश से एक देदीप्यमान सितारा ओझल हो गया है। अपनी खनकती और जादुई आवाज से आठ दशकों तक दुनिया को मंत्रमुग्ध करने वाली दिग्गज पार्श्व गायिका आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। रविवार को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 93 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से न केवल फिल्म इंडस्ट्री बल्कि दुनिया भर में फैले उनके करोड़ों प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है।

​आशा जी पिछले कुछ महीनों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं। शनिवार, 11 अप्रैल की रात को उन्हें तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। हालांकि शुरुआती दावों में दिल का दौरा पड़ने की बात कही गई थी, लेकिन उनकी पोती जनाई भोसले ने स्पष्ट किया था कि वह सीने में संक्रमण और अत्यधिक थकान से पीड़ित थीं। डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद, रविवार को सुरों की यह यात्रा हमेशा के लिए थम गई। उनके पुत्र आनंद भोसले ने इस दुखद समाचार की पुष्टि की है।

​पिता के साये से विश्व पटल तक का सफर

​8 सितंबर 1933 को जन्मी आशा भोसले को संगीत विरासत में मिला था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे। महज 9 वर्ष की आयु में पिता के निधन ने परिवार पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया, जिसके बाद घर की आर्थिक जिम्मेदारी आशा जी और उनकी बड़ी बहन स्वर कोकिला लता मंगेशकर के कंधों पर आ गई। इसी संघर्ष ने 1943 में उनके पहले फिल्मी गीत की नींव रखी। अपने बेमिसाल करियर में उन्होंने 12 हजार से अधिक गानों को अपनी आवाज दी, जो आज भी हर पीढ़ी की जुबान पर हैं।

​उपलब्धियों से भरा स्वर्णिम करियर

​आशा जी की प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया ने माना। उन्हें सात बार फिल्मफेयर बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर और दो बार नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया। वह पहली भारतीय गायिका बनीं जिन्हें प्रतिष्ठित ‘ग्रैमी अवॉर्ड’ के लिए नामांकन मिला। भारत सरकार ने उन्हें साल 2000 में ‘दादा साहेब फाल्के’ और 2008 में ‘पद्म विभूषण’ जैसे सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत किया। उनका नाम दो बार ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में भी दर्ज किया गया।

​निजी जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्ष

​आशा भोसले का व्यक्तिगत जीवन किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा। महज 16 साल की उम्र में उन्होंने परिवार के खिलाफ जाकर खुद से 15 साल बड़े गणपतराव भोसले से शादी की थी। हालांकि, ससुराल में हुए मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के कारण यह रिश्ता टूट गया और वह अपने बच्चों के साथ वापस मायके लौट आईं। वर्षों बाद उन्होंने महान संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) के साथ अपना घर बसाया, लेकिन 14 साल के साथ के बाद पंचम दा भी उन्हें अकेला छोड़ गए।

जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्होंने कई अपनों को खोने का दर्द सहा। 2015 में उनके बड़े बेटे हेमंत का कैंसर से निधन हुआ और उनकी बेटी वर्षा ने भी आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाया। उनके छोटे बेटे आनंद, जो उनके करियर और बिजनेस को संभालते थे, उनके साथ अंत तक ढाल बनकर रहे। आज भले ही आशा जी का शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया हो, लेकिन उनकी ‘नन्ही सी कली’ से लेकर ‘दम मारो दम’ तक की अमर आवाज हमेशा गूँजती रहेगी।