साहित्यिक विमर्श: ‘क़िस्सा-कहानी’ में गूँजी हाशिए की आवाज़, ‘हवाई हमला’ कहानी से जीवंत हुई दलित चेतना

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आगरा। “कोई मिलने नहीं आयेगा।” बूढ़ी किन्नर को पपीता सौंपते हुए पाती जब यह बोल रहा था। तब उसकी आँखों में बड़ी गहराई थी। छेदी उसे ऐसे ताक रहा था, जैसे किसी विमानभेदी तोप से बमबारी हुई हो और आसमान में आतिशबाजी करता हुआ गोला सही दिशा में जा रहा हो।”

यह अंश है हिंदी के युवा कथाकार अर्जुन सावेदिया की कहानी ‘हवाई हमला’ का, जिसके पाठ के साथ आगरा में होने वाले विशिष्ठ साहित्य कार्यक्रम ‘क़िस्सा कहानी -6’ का फिर से एक दिलचस्प सिलसिला चला। रविवार को अपराह्न 5 बजे से ‘नागरी प्रचारिणी सभा आगरा’ के लाइब्रेरी हॉल में शुरू हुए उक्त कार्यक्रम की प्रस्तुति आगरा की सांस्कृतिक संस्था ‘रंगलीला’ और कहानी की पत्रिका ‘कथादेश’ (नयी दिल्ली) ने की। कार्यक्रम का आयोजक एसिड हमलों की शिकार महिलाओं का संगठन ‘शीरोज़’ था। आतिथ्य ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ का रहा।

कार्यक्रम की शुरुआत में ‘अर्जुन की कहानी की रौशनी में ‘हिंदी कहानियों में दलित चेतना के स्वर’ विषय पर वरिष्ठ आलोचक प्रियम अंकित ने विषय प्रवर्तन करते कहा दलित राजनीति के उत्थान के साथ दलित शोषण को लेकर मुखर आवाज उठीं, जिनके चलते समाज में परिवर्तन आया है। पिछली बीसवीं सदी के अंतिम दशक में शुरू हुई वर्तमान हिंदी दलित कथा-साहित्य की यात्रा अपने तीन दशक पूरे कर चुकी है, और चौथे दशक में प्रवेश कर गई है। हालांकि यह अवधि बहुत बड़ी नहीं है, पर परिपक्वता की दृष्टि से छोटी भी नहीं है। इसलिए यह देखना जरूरी हो जाता है कि इस यात्रा में हिंदी दलित कथा-साहित्य किन पगडंडियों से गुजरकर, आज किन रास्तों पर पहुंचा है?

कार्यक्रम के संयोजन वरिष्ठ कथाकार शक्ति प्रकाश ने कहा कि कहानी की समीक्षा करते हुए कहा कि यह कहानी आज के दौर में दलित विमर्श को नए तरीके से पेश करती है। उन्होंने यह भी कहा कि कहानी में कई चीजों को भी के साथ जोड़ने से कुछ गैलमेल भी पैदा हो जाए हैं। मुख्य वक्ता लेखक एवं समीक्षक प्रो. रामवीर सिंह ने कहा कि बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर जॉर्ज पंचम से बात करते हुए कहा था आप जिस मुल्क पर आप शासन करते हैं वहां आदमी का मैला आदमी सिर पर उठाता है। उन्होंने कहानी की मीमांसा करते हुए कहा कि कहानी में दलित चेतन की शुरुआत सबसे पहले मशहूर कथाकार प्रेमचंद ने की।

अध्यक्षता वरिष्ठ कवि और मीडियाकर्मी नीरज जैन ने की। मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र सिंह ने कहा आज जो कहानी सुनाई है वह दलित चेतना पर केंद्रित तानाबाना बुना गया है। दलित विमर्श बहुत पुराना है, पूर्व के कालखंडों में भी इस पर चर्चा हुई है।

वरिष्ठ कवयित्री डॉ. शशि तिवारी ने कहा कि, आज की कहानी बहुत ही रुचिकर रही। भरत सिंह ने कहा कि कहानी बहुत अच्छी थी लेकिन वह कोई समस्या का ठोस समाधान नहीं देती है। दलित चेतना का जिक्र करते हुए कहा कि हमारी मानसिकता कुंद की जा रही है, लगता है हम आज भी समाज में आगे बढ़ने के बजाए पीछे लौट रहे हैं। जाकिर सरदार ने भी कहानी पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे।

आर.जे. अखलाक हुसैन ने एक शेर के जरिए संदेश देते कहा,
“कर के कत्ल शेख़ का जज्बा-ए ईमां की कसम
मैंने काबे के सुतुनो की हिफाज़त की है
कल के दंगे में एक ब्राह्मण को बचाकर मैने
मुफ्त घर बैठ के काबे की जियारत की है!”

वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनिल शुक्ल ने शहर के सभी साहित्य प्रेमियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ‘क़िस्सा कहानी’ हिंदी और उर्दू सहित अन्य भारतीय भाषाओं में रची जा रही समकालीन कहानियों के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से डिज़ाइन किया गया बेहतरीन कार्यक्रम है, जिसमें समय-समय पर इन भाषाओं के नामचीन कहानीकार अपनी-अपनी श्रेष्ठ कहानियों का मंच पाठ करते हैं। पाठ की समाप्ति पर श्रोता/दर्शक उनकी कहानी पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया देंते हैं। प्रत्येक कार्यक्रम में वरिष्ठ समीक्षक/आलोचक द्वारा कहानी की दशा पर महत्त्वपूर्ण वक्तव्य भी दिया जाता है।

संचालन प्रो. नसरीन बेगम ने किया। धन्यवाद मनमोहन भारद्वाज ने दिया। डॉ. गिरजा शंकर शर्मा, डॉ. महेश धाकड़, अर्निका माहेश्वरी, शलभ भारती, डॉ. कृष्ण के सिंह, अजय दुबे, प्रमोद सारस्वत, नरेश पारस, लईक खान, पूनम जाकिर, अमरदीप सिंह, नरेश तन्हा, अवधेश उपाध्याय, टोनी फास्टर, शरद सक्सेना, सुनील साकेत, वीरेंद्र ईमल, अरविंद समीर आदि मौजूद थे।