ईरान-अमेरिका वार्ता फ्लॉप: जेडी वेंस लौटे खाली हाथ, पाकिस्तान के लिए शुरू हुआ ‘काउंटडाउन’

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इस्लामाबाद: दुनिया की नजरें जिस शांति समझौते पर टिकी थीं, वह शनिवार को इस्लामाबाद की सरजमीं पर दम तोड़ गया। अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित सीजफायर वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई है। इस कूटनीतिक विफलता के तुरंत बाद अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस वाशिंगटन के लिए रवाना हो गए हैं, लेकिन पीछे छोड़ गए हैं एक गहराता युद्ध का साया और पाकिस्तान के लिए अस्तित्व का संकट।

पाकिस्तान, जो इस बातचीत की मध्यस्थता कर खुद को वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार ‘पीसमेकर’ के रूप में स्थापित करना चाहता था, अब खुद ही एक खतरनाक चक्रव्यूह में उलझ गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल असीम मुनीर की पूरी ताकत इस वार्ता को सफल बनाने में लगी थी, क्योंकि इसकी नाकामी पाकिस्तान के लिए केवल एक डिप्लोमैटिक हार नहीं, बल्कि सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़ी तबाही का संकेत है।

​सऊदी अरब की मजबूरी और ‘मिसाइल’ का खतरा

​इस संकट के बीच पाकिस्तान ने एक बड़ा जोखिम मोल लिया है। शनिवार को ही पाकिस्तान ने अपने लड़ाकू विमान और सैन्य टुकड़ियां सऊदी अरब रवाना कर दीं। यह कदम साल 2025 में हुए उस सुरक्षा समझौते का हिस्सा है, जिसमें पाकिस्तान ने सऊदी अरब की संप्रभुता की रक्षा करने का वचन दिया था। चूँकि सऊदी अरब अमेरिकी खेमे का हिस्सा है और ईरान के निशाने पर है, ऐसे में सऊदी का साथ देना पाकिस्तान की मजबूरी है। लेकिन यही मजबूरी उसे ईरानी मिसाइलों की जद में ले आई है। 900 किलोमीटर लंबी ईरान-पाक सीमा अब एक सक्रिय ‘फ्लैशप्वाइंट’ में तब्दील हो सकती है।

​अमेरिका की ‘एयरबेस’ वाली मांग और बलूचिस्तान का मोर्चा

वार्ता टूटने के बाद वाशिंगटन अब सैन्य विकल्पों की ओर देख रहा है। सूत्रों की मानें तो अमेरिका एक बार फिर पाकिस्तान से अपने हवाई अड्डों (एयरबेस) के इस्तेमाल की अनुमति मांग सकता है। खासकर बलूचिस्तान स्थित एयरस्ट्रिप्स ईरान के परमाणु ठिकानों पर स्ट्राइक करने के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम हैं।

यहाँ पाकिस्तान के सामने ‘कुआं और खाई’ वाली स्थिति है तेहरान पहले ही साफ कर चुका है कि अगर किसी भी देश ने अपनी धरती का इस्तेमाल अमेरिका को करने दिया, तो वह देश सीधे तौर पर ईरान का निशाना बनेगा। यानी पाक पर ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा मंडराने लगेगा।

यदि पाकिस्तान इनकार करता है, तो उसे मिलने वाली आर्थिक मदद और IMF से मिलने वाले बेलआउट पैकेज पर तलवार लटक जाएगी।

एक तरफ अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अमेरिका का साथ जरूरी है, तो दूसरी तरफ सीमा सुरक्षा के लिए ईरान से दुश्मनी मोल लेना मुमकिन नहीं। इस विफल वार्ता ने पाकिस्तान को ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया है जहाँ से निकलने का हर रास्ता उसे बर्बादी की ओर ले जाता दिख रहा है।