ढाका/नई दिल्ली: मध्य पूर्व (Middle East) में जारी युद्ध और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को हिलाकर रख दिया है। इसका सबसे भीषण असर पड़ोसी देश बांग्लादेश पर पड़ा है, जहाँ ईंधन की भारी किल्लत के चलते हाहाकार मचा हुआ है। इस मुश्किल घड़ी में भारत एक बार फिर ‘सच्चे दोस्त’ की भूमिका निभाते हुए मदद के लिए आगे आया है।
भारत-बांग्लादेश डीजल समझौता: पारबतीपुर सीमा से पहुंची मदद
भारत और बांग्लादेश के बीच हुए रणनीतिक ऊर्जा सहयोग के तहत मंगलवार को 5000 टन डीजल की एक बड़ी खेप पाइपलाइन के जरिए बांग्लादेश भेजी गई। यह आपूर्ति पारबतीपुर सीमा के रास्ते बांग्लादेश में प्रवेश कर चुकी है।
बांग्लादेश पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPC) के चेयरमैन मुहम्मद रेजानुर रहमान ने इस आयात की पुष्टि करते हुए बताया कि समझौते के तहत भारत हर साल 1,80,000 टन डीजल की आपूर्ति करेगा। संकट को देखते हुए बांग्लादेश अगले दो महीनों के भीतर ही अपना 90,000 टन का छह माही कोटा पूरा करने की योजना बना रहा है।
देश में तेल की ‘राशनिंग’ और पैनिक बाइंग
बांग्लादेश में ईंधन का स्टॉक खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। BPC के आंकड़ों के अनुसार, देश में अब केवल दो सप्ताह का स्टॉक बचा है। सामान्य दिनों में जहाँ 12,000 टन डीजल की मांग होती थी, वहीं अब आपूर्ति घटकर 9,000 टन रह गई है। स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने सख्त राशनिंग लागू की है:
मोटरसाइकिल: अधिकतम 2 लीटर।
कार: अधिकतम 10 लीटर।
SUV: 20 से 25 लीटर।
ट्रक: सीमित मात्रा।
जमाखोरों और तस्करों पर ‘मोबाइल कोर्ट’ का शिकंजा
ईंधन की कृत्रिम कमी पैदा करने वाले भ्रष्ट व्यापारियों पर लगाम लगाने के लिए बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्रालय ने ‘मोबाइल कोर्ट’ अभियान शुरू किया है। कार्यकारी मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में राजधानी ढाका के पेट्रोल पंपों पर छापेमारी की जा रही है।
तेजगांव (MPL): जांच के दौरान यह पंप पूरी तरह ‘ड्राई’ पाया गया।
कालाबाजारी: मंत्रालय को सूचना मिली है कि कुछ पंप मालिक ऊंचे मुनाफे के लालच में स्टॉक छिपा रहे हैं या सीमा से अधिक तेल बेचकर तस्करी को बढ़ावा दे रहे हैं।
वैश्विक संकट का स्थानीय असर
ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष के कारण समुद्री रास्तों से तेल का आयात बाधित हुआ है। बांग्लादेश अपनी जरूरतों के लिए विदेशी आयात पर निर्भर है, ऐसे में भारत से पाइपलाइन के जरिए मिलने वाली यह मदद देश की चरमराती अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था के लिए ‘लाइफलाइन’ साबित हो रही है।

