नई हिंदी पुस्तक ‘कहानियों का आँगन’ एक ऐसे ‘आँगन’ की कल्पना है, जहाँ रिश्तों की दीवारें गिरें और बातचीत फिर से सहज हो जाए
भावनात्मक बुद्धिमत्ता और संवाद के क्षेत्र में एक प्रभावशाली आवाज़, अनुभवी इमोशनल इंटेलिजेंस लाइफ़ कोच और कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ. नेहा राय ने अपनी पहली हिंदी किताब ‘कहानियों का आँगन’ प्रस्तुत की है। यह किताब एक ऐसे ‘आँगन’ को दोबारा रचने का विचार है, जहाँ रिश्तों के बीच खड़ी दीवारें गिरें और लोग एक-दूसरे से खुलकर बात कर सकें — आधुनिक जीवनशैली को अपनाते हुए भी।

किताब के केंद्र में है अविरल, एक नवविवाहित युवक जो पुणे में अपनी पत्नी के साथ नई ज़िंदगी की शुरुआत कर रहा है। काम के सिलसिले में वर्षों बाद वह अपने गाँव लौटता है, जहाँ एक पुराना आँगन उसे याद दिलाता है कि कैसे कभी आँगन वह जगह हुआ करती थी जहाँ दीवारें कम और बातें ज़्यादा होती थीं — जहाँ लोग सहजता से बैठते, सुनते और जुड़ते थे। यहीं से अविरल के भीतर एक ख़याल जन्म लेता है: क्यों न अपने पुणे वाले घर में भी वैसा ही एक ‘कहानियों का आँगन’ बनाया जाए, जहाँ रिश्तों की दीवारें गिरें और शादी के बीच आई खामोशियाँ आख़िरकार बोल पाएँ। पर यह राह आसान नहीं — दीवारें गिराकर खुलकर बात करना कभी सहज नहीं होता। यही कोशिश और इसकी चुनौतियाँ किताब का मूल हैं।
डॉ. राय के अनुसार, यह किताब किसी उपदेश के लिए नहीं, बल्कि एक एहसास के लिए लिखी गई है। “समय के साथ हम सब कहीं न कहीं ज़्यादा निजी और बंद होते जा रहे हैं, बातें कम हो गई हैं और साझा करना उससे भी कम,” वे कहती हैं। “आँगन कभी वह जगह थी जहाँ दीवारें नहीं होती थीं और परिवार अपने-आप जुड़ जाता था। यह किताब उसी आँगन को दोबारा बनाने की कोशिश है — अगर घर में नहीं, तो कम से कम अपनी ज़िंदगी और रिश्तों में।”
मूल रूप से वाराणसी से ताल्लुक़ रखने वाली डॉ. राय का कहानियों और भावनाओं से रिश्ता बचपन से ही गहरा रहा है। पेशे से दंत चिकित्सा की पढ़ाई करने के बावजूद उनका असली रुझान हमेशा इंसानी भावनाओं को समझने में रहा। आज वे प्रमुख रियल एस्टेट मार्केटिंग एजेंसी इनसोम्नियाक्स (Insomniacs) में कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में काम करती हैं, जहाँ उनका लेखन घरों को महज़ ‘प्रॉपर्टी’ नहीं, बल्कि यादों और रिश्तों का विस्तार मानकर रचा जाता है। एक इमोशनल इंटेलिजेंस लाइफ़ कोच के रूप में वे लोगों को अपनी भावनाओं से जुड़ने और रिश्तों में बेहतर संवाद बनाने में मदद करती रही हैं।
कॉरपोरेट दुनिया की व्यस्तता के बीच भी उन्होंने अपने भीतर के कहानीकार को ज़िंदा रखा। एक स्कूल प्रिंसिपल रहे अपने दादाजी के इर्द-गिर्द लोगों और बातचीत का जो माहौल वे बचपन से देखती आईं, उसी जुड़ाव की झलक आज उनके लेखन में नज़र आती है।
‘कहानियों का आँगन’ एक सवाल छोड़ जाती है — जैसे-जैसे हमारे घर बड़े और सुविधाजनक होते गए, क्या रिश्तों के बीच खड़ी दीवारें भी उतनी ही ऊँची होती गईं? क्या एक ही छत के नीचे रहना और सच में एक-दूसरे के साथ होना, अब दो अलग बातें बन चुकी हैं? डॉ. राय का मानना है कि इन दीवारों को गिराना मुमकिन है — बशर्ते हम अपने हिस्से का एक ‘आँगन’ बनाने को तैयार हों।


