NEP 2020 के तहत DEI की बड़ी पहल: शोध और नवाचार को गति देंगे AI टूल्स, 5 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम में मंथन शुरू

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आगरा, 18 मई। उत्तर प्रदेश के आगरा स्थित प्रतिष्ठित दयालबाग शिक्षण संस्थान (DEI) में शैक्षणिक अनुसंधान को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) आधारित आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और सराहनीय पहल की गई है। संस्थान में ‘शैक्षणिक अनुसंधान में एआई उपकरण के अनुप्रयोग’ विषय पर पांच दिवसीय राष्ट्रीय स्तर के फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम (एफडीपी) का सोमवार को भव्य शुभारम्भ हुआ।

एआईयू-डीईआई-एएडीसी (AIU-DEI-AADC) के तत्वावधान में आयोजित हो रहे इस विशेष कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान की पारंपरिक प्रार्थना के साथ की गई, जिसके तुरंत बाद देश भर से जुड़े प्रख्यात शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने एआई आधारित शोध प्रणाली पर अपना गहरा मंथन शुरू कर दिया।

​इस गरिमामयी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में दयालबाग शिक्षण संस्थान के निदेशक प्रो. सी. पटवर्धन उपस्थित रहे। उन्होंने अपने प्रेरणादायी और सारगर्भित उद्बोधन में शोध के क्षेत्र में एआई तकनीकी से होने वाले लाभों के साथ-साथ इसकी चुनौतियों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।

प्रो. पटवर्धन ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता शोध कार्यों की शुरुआती झिझक को दूर करने में क्रांतिकारी साबित हो सकती है। यह ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ पहल के तहत उपलब्ध शोध पत्रों के गहन विश्लेषण, शोध की कमियों (Research Gaps) के मूल्यांकन और जटिल डेटा विश्लेषण में बेहद उपयोगी सिद्ध हो सकती है। हालांकि, उन्होंने शोधार्थियों को सचेत करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि एआई द्वारा प्रस्तुत निष्कर्षों को बिना विवेक के आंख मूंदकर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। शोधार्थियों को परिणामों की स्वतंत्र व्याख्या और उनका मूल्यांकन स्वयं अपने विवेक से करना होगा।

​कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए इसकी संयोजक एवं एआईयू-डीईआई-एएडीसी की नोडल अधिकारी प्रो. ज्योति गोगिया ने वर्तमान शैक्षणिक एवं शोध परिदृश्य में एआई आधारित कौशलों की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने अकादमिक लेखन और अनुसंधान का जिक्र करते हुए जोर दिया कि एआई उपकरणों का उपयोग करते समय नैतिकता (Ethics) और शैक्षणिक सत्यनिष्ठा (Academic Integrity) को बनाए रखना हर हाल में अत्यंत आवश्यक है।

​इसके बाद कार्यक्रम की सह-संयोजक डॉ. पूर्णिमा भटनागर ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि यह एफडीपी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के मुख्य उद्देश्यों के सर्वथा अनुरूप है। यह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी एकीकरण, नवाचार और शोध उत्कृष्टता को बढ़ावा देने की दिशा में संस्थान का एक मील का पत्थर साबित होने वाला कदम है।

इस पूरे एफडीपी का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को शैक्षणिक अनुसंधान की संपूर्ण प्रक्रिया में एआई की भूमिका के प्रति एक आधारभूत समझ विकसित कराना और शोध के विभिन्न चरणों में एआई टूल्स के प्रभावी व सुरक्षित उपयोग के लिए उन्हें पूरी तरह दक्ष बनाना है।

​इस पांच दिवसीय कार्यक्रम के तकनीकी सत्रों में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए शिक्षाविद और विषय विशेषज्ञ अपने विचार और ज्ञान साझा कर रहे हैं। आमंत्रित मुख्य वक्ताओं में कर्णावती विश्वविद्यालय गांधीनगर से प्रो. किशोर भानुशाली, आर्यभट्ट कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. प्रीति जगवानी, जयपुरिया इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट नोएडा से डॉ. अनुजा शुक्ला, शारदा स्कूल ऑफ बिजनेस स्टडीज़ शारदा यूनिवर्सिटी आगरा से सीए संजीव सिंह ठाकुर, डीईआई के पूर्व छात्र डॉ. ध्रुव भंडारी और श्री शिवि कुलश्रेष्ठ प्रमुख रूप से शामिल हैं।

​इसके अतिरिक्त, दयालबाग शिक्षण संस्थान के भौतिकी एवं कंप्यूटर विज्ञान विभाग से प्रो. संदीप पॉल, डॉ. लोतिका सिंह और हार्दिक चड्ढा, तथा अभियांत्रिकी संकाय के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग से डॉ. के. श्रीनिवास, डॉ. ए. चरण कुमारी, डॉ. वी. प्रेम प्रकाश एवं सुश्री ऋतेश कुमारी इस कार्यक्रम में विशेषज्ञ वक्ता के रूप में अपनी महत्वपूर्ण सहभागिता दे रहे हैं।

कार्यक्रम को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए विभिन्न सत्रों के अध्यक्षों (सत्राध्यक्षों) की भूमिका में डॉ. नमिता भाटिया, डॉ. मोगला अचल, डॉ. सोना दीक्षित, डॉ. रेशम चोपड़ा, डॉ. अमला चोपड़ा, डॉ. अपर्णा सत्संगी, डॉ. कविता कुमार और डॉ. पूर्णिमा भटनागर अपनी सेवाएं दे रही हैं।

इस राष्ट्रीय स्तर के एफडीपी में हाइब्रिड मोड (ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों) के माध्यम से देश भर से कुल 325 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। इस वृहद कार्यक्रम के सफल संचालन, तकनीकी समन्वय और व्यवस्थाओं को संभालने में डॉ. आयुषी कुकरेजा, श्री पुष्पेन्द्र कुमार, सुश्री रितिका अग्रवाल, सुश्री सुहाना पांडेय, सुश्री निधि, सुश्री शिवानी उपमन्यु, सुश्री प्रेम सखी और श्री सात्विक शुक्ला ने अपना सराहनीय योगदान दिया।