नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली इस वक्त जलवायु परिवर्तन के सबसे भयावह दौर का सामना कर रही है। थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) की ताज़ा रिपोर्ट ने दिल्ली के भविष्य को लेकर ‘रेड अलर्ट’ जारी किया है। ‘हीट रिस्क इंडेक्स’ के मुताबिक, दिल्ली का 55 प्रतिशत हिस्सा अब भीषण गर्मी के ‘अति उच्च जोखिम’ (Extreme High Risk) क्षेत्र में तब्दील हो चुका है, जबकि शेष 45 फीसदी हिस्सा ‘उच्च जोखिम’ की श्रेणी में है।
गायब हो गई रातों की ठंडक
रिपोर्ट का सबसे डरावना पहलू रातों का गर्म होना है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशक (2011-2022) में 1982-2011 की तुलना में हर सीज़न में 6 अतिरिक्त गर्म रातें दर्ज की गई हैं। यानी अब सूरज ढलने के बाद भी वातावरण ठंडा नहीं हो रहा है। शहरीकरण की अंधी दौड़ ने दिल्ली को ‘कंक्रीट के जंगल’ में बदल दिया है, जिससे मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों के मुकाबले दिल्ली में रातों का तापमान अधिक चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
उमस और ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का जानलेवा संगम
दिल्ली की जंग अब सिर्फ तपिश से नहीं, बल्कि उमस (Humidity) से भी है। पिछले 10 सालों में सापेक्ष आर्द्रता में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसके कारण ‘फील लाइक’ तापमान (महसूस होने वाली गर्मी) वास्तविक तापमान से कहीं ज्यादा घातक साबित हो रहा है। ऊंची इमारतें और सघन आबादी ‘अर्बन हीट आइलैंड’ बना रही हैं, जो दिन भर की गर्मी को सोख लेती हैं और रात में उसे बाहर नहीं निकलने देतीं।
इन पर मंडरा रहा है मौत का साया
बढ़ती गर्मी का सबसे ज्यादा प्रहार हाशिए पर रहने वाले लोगों, बुजुर्गों और बच्चों पर हो रहा है। विशेष रूप से झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोग, जिनके पास कूलिंग (एसी/कूलर) की सुविधा नहीं है, वे ‘हीट स्ट्रेस’ के सीधे निशाने पर हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति शरीर के अंगों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।
सरकार का ‘हीट एक्शन प्लान’ ही एकमात्र सहारा?
संकट को भांपते हुए रेखा गुप्ता सरकार ने अपना ‘हीट एक्शन प्लान’ (HAP) जारी किया है। यह योजना आपातकालीन राहत के साथ-साथ भविष्य के लिए दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर जोर देती है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि अगर इस प्लान को धरातल पर कड़ाई से लागू नहीं किया गया, तो दिल्ली की गर्मी आने वाले वर्षों में जीवन के लिए असहनीय हो जाएगी।

