आगरा: आगरा का खंदौली कस्बा इन दिनों जानवरों के आतंक के साये में जीने को मजबूर है। रविवार का दिन कस्बेवासियों के लिए किसी बुरे सपने जैसा रहा। एक तरफ जहाँ सैकड़ों बंदरों के आक्रामक झुंड ने स्थानीय लोगों और चिकित्सा जगत के प्रतिष्ठित लोगों को निशाना बनाया, वहीं दूसरी ओर हाईवे पर खुलेआम घूम रहे आवारा सांड ने एक वृद्ध पान विक्रेता को अधमरा कर दिया। लगातार हो रही इन घटनाओं ने स्थानीय प्रशासन और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बंदरों के झुंड का चौपार में उत्पात
कस्बे के रोडवेज बस स्टैंड के पास स्थित चौपार क्षेत्र में रविवार को उस समय अफरा-तफरी मच गई जब 150 से 200 बंदरों के एक बड़े झुंड ने एक साथ हमला बोल दिया। दिन भर में चार बार हुए इन हमलों ने लोगों के मन में दहशत भर दी। बंदरों के इस हमले में प्रसिद्ध फिजिशियन डॉ. सुरेश चंद्र अग्रवाल गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनके सिर में चोट आई है।
इसके अलावा मेडिकल स्टोर संचालक श्याम सुंदर सिंह, ओमा बुआ और छुटकू अग्रवाल समेत कुल छह लोग घायल हुए हैं। लोगों का कहना है कि कस्बे की पानी की टंकी में हाल ही में कई बंदरों की मौत हुई है, जिसके बाद से बाकी बंदरों का व्यवहार अत्यंत हिंसक और आक्रामक हो गया है। भोजन की किल्लत और उचित प्रबंधन के अभाव में ये बंदर अब आबादी के लिए काल बन गए हैं।
हाइवे पर सांड का जानलेवा हमला
दूसरी ओर, आगरा-अलीगढ़ हाईवे पर आवारा सांडों का तांडव जारी है। देर रात जब 65 वर्षीय पान विक्रेता बाबूलाल शर्मा अपनी दुकान बंद कर घर जाने के लिए वाहन का इंतजार कर रहे थे, तभी एक सांड ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि सांड ने बाबूलाल को सींगों पर उठाकर कई बार सड़क पर पटक दिया, जिससे उनके सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं। स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहाँ से नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें आगरा रेफर कर दिया गया।
प्रशासनिक लापरवाही से आक्रोश
खंदौली के निवासियों का कहना है कि पिछले 15 दिनों से बंदरों और सांडों का आतंक जारी है, लेकिन नगर पंचायत और वन विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। आवारा सांडों को पकड़कर गौशाला भेजने या बंदरों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करने की मांग कई बार उठ चुकी है, लेकिन हर बार उन्हें कोरे आश्वासन ही मिले हैं।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इन जानवरों से निजात नहीं दिलाई गई, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे। कस्बे के लोगों के लिए अब अपने बच्चों को घर से बाहर भेजना भी किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है।


