उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बार फिर अपने सोशल मीडिया हैंडल के जरिए भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। इसके साथ ही उन्होंने अयोध्या में आयोजित एक भागवत कथा के दौरान अपने आध्यात्मिक और वैचारिक अनुभव भी साझा किए हैं।
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक वीडियो शेयर करते हुए एक मार्मिक कविता के जरिए सत्ता और व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने लिखा मानवता की रक्षा है सामूहिक ज़िम्मेदारी
जब भेदभाव के शूल का चुभना रहे जारी
अपमानों का बने निशाना दुखी माँ-नारी
युवाओं के सपनों पर तलवार चले दुधारी
जब सत्ता करे अत्याचार वंचितों पर भारी
तब तू उठा त्रिशूल और बन सुदर्शनधारी!
अयोध्या में भागवत कथा का किया श्रवण
राजनीतिक बयानों के इतर, अखिलेश यादव ने अयोध्या की पावन भूमि पर भागवत कथा सुनने के अपने अनुभव को भी साझा किया। उन्होंने लिखा कि आज अयोध्या की इस पवित्र धरती पर कलियुग के ताप को हरने वाली और लोक-परलोक को संवारने वाली ‘भागवतकथा’ का अमृतपान करने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ।
बचपन की यादों को ताजा करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने बचपन में सुना था कि जो भव के बंधन से मुक्त कराए, वही भागवत है और जो मनुष्य की व्यथा को हरे, वही कथा है। आज के दौर में जब समाज अहंकार, सत्ता, जाति, भेदभाव, वैमनस्य, ऊंच-नीच, छुआछूत और अन्य मानसिक बंधनों से जकड़ा हुआ है, तब भागवत कथा का महत्व और प्रासंगिकता कई गुना बढ़ जाती है।
’कथा मनोवर्द्धन करती है, मनोरंजन नहीं’
अखिलेश यादव ने कथा के मर्म को समझाते हुए कहा कि कथा सिर्फ कोई कहानी नहीं होती जो केवल मनोरंजन करे, बल्कि यह ‘मनोवर्द्धन’ करती है। कहानी मन को कुछ समय के लिए बहलाती है, जबकि कथा मनुष्य के मन और उसके मनोबल को विशाल बनाती है। कहानी के समाप्त होने पर जहां आनंद का एक क्षणिक अनुभव होता है, वहीं भागवत कथा के समापन पर एक गहरे उत्तरदायित्व का अहसास होता है।
उन्होंने अंत में कहा कि भागवत कथा केवल भगवान श्रीकृष्ण के जीवन के बारे में नहीं बताती, बल्कि हमें उनके जैसा बनने की प्रेरणा देती है और यह व्यक्तिगत प्रेम व सामाजिक समानता का एक जीवंत संविधान है।
