आगरा: आगरा की विशेष एनडीपीएस (NDPS) कोर्ट ने पांच साल पुराने एक चर्चित मादक पदार्थ बरामदगी मामले में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने पाया कि पुलिस द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों और बरामद पदार्थ की स्थिति में भारी विरोधाभास था, जिसके चलते आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
पुलिस के दावे की पोल खुली, अदालत में बदला पदार्थ का रंग
यह मामला सदर थाना क्षेत्र का है, जहां पुलिस ने करीब पांच वर्ष पूर्व एक आरोपी को 450 ग्राम हेरोइन के साथ गिरफ्तार करने का दावा किया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान जब अदालत में सीलबंद पैकेट को खोला गया, तो उसमें मौजूद पदार्थ पुलिस और गवाहों के बयानों से पूरी तरह मेल नहीं खाया। पुलिस और अभियोजन पक्ष के गवाहों ने बरामद पदार्थ को ‘सफेद रंग’ की हेरोइन बताया था, लेकिन अदालत में पैकेट के भीतर से ‘काले रंग’ का पदार्थ निकला। इस बड़े विरोधाभास ने पुलिस की बरामदगी की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
जांच प्रक्रिया में सामने आईं कई खामियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच प्रक्रिया में बरती गई लापरवाही को भी गंभीरता से लिया। सबसे बड़ी चूक यह सामने आई कि बरामद मादक पदार्थ का नमूना (सैंपल) घटना के तुरंत बाद फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया था। पुलिस ने इसे 12 दिनों के विलंब के बाद प्रयोगशाला भेजा। एनडीपीएस अधिनियम के तहत मादक पदार्थ की सुरक्षित कस्टडी और साक्ष्यों की शृंखला (Chain of Custody) का समय पर वैज्ञानिक परीक्षण अनिवार्य है, जिसमें पुलिस पूरी तरह विफल रही।
संदेह का लाभ मिला आरोपी को
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। साक्ष्यों में विरोधाभास, पुलिस द्वारा सैंपल भेजने में देरी और बरामद पदार्थ की स्थिति पर उत्पन्न संदेह का सीधा लाभ आरोपी को दिया गया। इसी आधार पर विशेष एनडीपीएस कोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।
जांच एजेंसियों के लिए एक सीख
यह निर्णय एनडीपीएस जैसे संवेदनशील मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं और वैज्ञानिक साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रक्रियात्मक चूक का फायदा सीधे तौर पर आरोपियों को मिलता है और इससे अभियोजन पक्ष का पूरा मामला कमजोर हो जाता है। इस फैसले के बाद एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और उनकी जवाबदेही पर चर्चा तेज हो गई है।


